जिले के अमर शहीदों को भूल गई सरकार, राष्ट्रवाद के खोखले नारों से जिलावासियों में असंतोष व्याप्त

आलोक कुमार के कलम से

देश में ब्रिटिश संतलत के विरुद्ध उठने वाले आक्रोश और राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम में औरंगाबाद के वीर सपुतो का भी गौरवशाली इतिहास रहा है।हम उनके नामों से न सिर्फ गौरवान्वित होते हैं बल्कि आज उनकी कुर्बानी और शहादत मेरे लिए प्रेरन्ना स्रोत बना हुआ है और आगे भी बना रहेगा। चाहे डगर कितना भी कठोर और चुनौतीपूर्ण क्यों न हो। मुझे विश्वास और भरोसा है कि हमारे तरह और कितने

आलोक कुमार, निदेशक सह संपादक खबर सुप्रभात

जिलावासियों के लिए इन अमर शहीदों का आदर्श प्रेरणा श्रोत और गौरव होगा जिसका अंदाजा लगाना मेरे लिए मुश्किल हो सकता है। लेकिन यह भी सच्च है कि आज इन सभी अमर शहीद व वीर सपुतो के सपनों का परवाह किए बगैर निर्लज्जता पूर्वक जिले के आन-बान – शान को निलाम करते थक नहीं रहे हैं। तथा चंद निहित स्वार्थ में फंस कर सत्ता के दलाली, सरकारी कार्यालयों में दलाली और यहां तक कि जातिय चश्मा लगाकर समाज में विषाक्त वातावरण तैयार करने में सक्रिय हो रहे हैं तथा समाज को बांटने जैसे घृणित कुकर्म कर रहे हैं। ऐसे में पवई राज के चर्चित सपुत राजा नारायण सिंह जिन्होंने 1857 के विद्रोह से लगभग 87 वर्ष पूर्व सन् 1770 के दशक में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ बग़ावत का झंडा उठाए थे। खंराटी (ओबरा ) के वीर सपूत शहीद जगतपति कुमार जो 11 अगस्त 1942 में पटना सचिवालय पर राष्ट्रीय तिरंगा फहराते हुए शहीद हुए थे। 1930 में गांधी जी के सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान औरंगाबाद सदर प्रखंड के बाबू कर्मा गांव के बहादुर सपूत कुमार बद्री नारायण नमक कानून को तोडे थे और अंग्रेज़ी सल्तनत को चुनौती पेश किये थे। लेकिन आज दुर्भाग्य है कि सरकार और जनप्रतिनिधियों द्वारा उन्हें नज़र अंदाज़ किया जा रहा है। उन वीर सपुतो का पैतृक हवेली आज खंडहर बना हुआ है। उनके स्मृतियों को उचित सम्मान और संरक्षण नहीं हो रहा है जो गंभीर मामला है और आजादी के दिवाने को नज़र अंदाज़ किया जा रहा है। राष्ट्रवाद के खोखले नारा होने का ज्वलंत उदाहरण है इन वीर सपूतों को नजरंदाज करना।