भरत तिवारी हत्या मामले में छः दिन बाद प्राथमिकी दर्ज करना कहीं साक्ष्य मिटाने का षड्यंत्र तो नहीं? सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का भी हुआ उलंघन


केन्द्रीय न्यूज डेस्क ख़बर सुप्रभात समाचार सेवा


भोजपुर जिला के साहपुर थाना क्षेत्र अंतर्गत ग्राम बिलौटी निवासी भरत तिवारी को पुलिस द्वारा हत्या करने का मामला तुल पकड़े जा रहा था। हालांकि पुलिस द्वारा एनकाउंटर बताया जा रहा था लेकिन परिजन, गांव घर तथा प्रत्यक्षदर्शियों द्वारा हत्या करार दिया जा रहा था। अंततः छः दिन बाद स्थानीय थाना में दोषी पुलिसकर्मियों के विरुद्ध कांड संख्या 178/26 दर्ज किया गया है। प्राथमिकी दर्ज होते ही एनकाउंटर नहीं बल्कि सोची समझी रणनीति के तहत पुलिस द्वारा भरत तिवारी को हत्या कर दिया गया था यह साफ़ हो गया है। लेकिन अब सवाल यह उठता है कि घटना के बाद जब भरत तिवारी के मां द्वारा हत्या करने के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज करने हेतु आवेदन दिया गया तो आखिर प्राथमिकी दर्ज करने में छः दिन विलम्ब क्यों किया गया। यह एक गंभीर सवाल खड़ा हो रहा है। उल्लेखनीय है कि किसी भी संज्ञेय अपराध के विरुद्ध धारा 173(A) के तहत प्राथमिकी तुरंत दर्ज करना है और इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट का भी आदेश निर्गत है। लेकिन छः दिनों तक प्राथमिकी दर्ज नहीं करना जहां कानून और सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का अवमानना हुआ है वहीं घटना स्थल पर साक्ष्य को मिटाने का भी षड्यंत्र कहा जा सकता है।इस मामले में पीयूसीएल ( मानवाधिकार संगठन ) के राष्ट्रीय पार्षद दिनेश अकेला ने कहा कि शासन -प्रशासन से न्याय का उम्मीद आज के तारीख़ में नहीं किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि विलम्ब के लिए जिम्मेवार थानाध्यक्ष पर बीएनएस के धारा 199+Contempt of Court का मुकदमा भी दर्ज होना चाहिए।