आलोक कुमार के कलम से
बिहार में 2005 से नीतीश कुमार के नेतृत्व में सरकार चल रही थी। सता के मलाई चाभने का लत उन्हें इतना जड़ मजबूत हो चुका था कि सत्ता के लिए उन्हें सभी राजनैतिक नैतिकता को ताख पर रखकर कभी महागठबंधन तो कभी एनडीए का दामन थाम्हते रहे और सभी को अपने अंगुली पर नचाते रहे।मैं नहीं तो किसी को बचाते हैं और नहीं किसी को फंसाते हैं, भ्रष्टाचार अपराध और कौमलिजम से भी कोई

समझौता नहीं किया जायेगा आदि कितने लोक लुभावन घोषणाएं और दावे करते रहे। लेकिन यदि गौर करें और जो अभी हाल के दिनों में मनी लांड्रिंग व टेंडर घोटाला के मामले में रिशु श्री उर्फ रिशु सिन्हा के ठिकानों पर छापेमारी के बाद अगुत संपत्ति प्रकाश में आया है और गिरफ्तारी के बाद जो काले चिट्ठे धिरे धिरे सामने आ रहा है उससे नीतीश कुमार का दामन में कितना दाग था सब-कुछ पोल पट्टी खोल कर रख दिया है। अभी मामले में दो आइएएस अधिकारी निलंबित हुए हैं और उम्मीद जताया जा रहा है कि सचमुच में यदि आगे का कारवाई पार्दर्शिता व ईमानदारी से होते रहा तो अभी दर्जन भर आइएएस अधिकारी और कई बड़े अभियंता पर भी गाज गीरेगा। इतना ही नहीं कई सरकार में मंत्री रहे भी सलाखों के पीछे जा सकते हैं।अब सवाल यह है कि क्या मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के शासन काल में भ्रष्टाचार का इतना बड़ा खेल जो पशुपालन (चारा) घोटाला से कई गुना ज्यादा का घोटाला होते रहा और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को इसकी भनक तक नहीं था यह कैसे संभव हो सकता है? यदि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को इसकी भनक नहीं था तो फिर पशुपालन (चारा) घोटाला का भनक लालू प्रसाद यादव को कैसे था कि वे सजायफ्ता बने? यह भी आज जनमानस के बीच यक्ष प्रश्न बनते जा रहा है। इतना ही नहीं और कई घोटाला और अपराधिक घटनाओं का यदि सचमुच में पार्दर्शिता व ईमानदारी से जांच हो तो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के दामन पर और सवाल खड़ा होगा।यह सब बड़े बड़े घोटाला और घटनाएं हैं जो प्रकाश में आया है। लेकिन राज्य के प्रायः सभी जिलों में सरकार प्रायोजित योजनाओं को भ्रष्टाचार का भेंट चढ़ा दिया गया है और जांच के नाम पर जांच अधिकारियों द्वारा चांच को भ्रष्टाचार का भेंट चढ़ा दिया गया जिसका एक नहीं अनगिनत उदाहरण और प्रमाण खुद मेरे पास आज भी मौजूद है। वैसे और कितना प्रमाण दर्जनों सैंकड़ों लोगों के पास होगा इसकी अंदाजा अभी मेरे पास नहीं है । टेबल वर्क पुलिस अनुसंधान और नाजायज़ गिरफ्तारी के जरिए भ्रष्टाचार और शासन प्रशासन का काले कारनामों का पोल पट्टी खोलने वाला चाहे सामाजिक राजनैतिक कार्यकर्ता हों या फिर पत्रकार, साहित्यकार या लेखक सभी को डराने-धमकाने का कार्य होते रहा और गोदी (चाटुकार)मिडिया का फौज खड़ा कर दुष्प्रचार कराया गया और आम लोगों यहां तक कि न्यायालय को भी दिग्भ्रमित करने का प्रयास किया गया।बार बार मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को भी पत्र लिखकर अवगत कराने के बावजूद यदि पारदर्शिता पूर्ण जांच और कारवाई नहीं होना तथा सच्चाई को जन-मानस के बीच नहीं लाना यह सब जाहिर होता है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को यह कहना कि मैं न तो किसी को फंसाते हैं और नहीं बचाते हैं यह सब मात्र जुमला है और सच्चाई कुछ और है।

