घड़हल्ले से बेचे जा रहे हैं नकली खाद्य पदार्थ, प्रशासन सोयी है कुंभकर्णी नीद्रा में

औरंगाबाद : सुनील कुमार सिंह/ अम्बुज कुमार खबर सुप्रभात समाचार सेवा


पुरे औरंगाबाद जिला मुख्यालय सहीत तमाम प्रखंड़ क्षेत्रों के बाजारों में नकली खाद्य पदार्थ घड़हल्ले से बेचे जा रहे हैं, प्रशासन के आलाधिकारी सोये हैं कुंभकर्णी नीद्रा में । तमाम मिठाई के दुकानों पर नकली तथा मिलावटी दुध से बनी रंग – बिरंगी मिठाईयाँ ग्राहकों को परोसी जा रही हैं। नकली खोवा ( मावा ), नकली दुध एवं नकली पनीर से बनें ही खाद्य

सामग्री विभिन्न लाईन होटलों, स्वीट्स होम, नास्ते की दुकानों में बे – रोक – टोक बेची जा रही हैं। औरंगाबाद शहर मुख्यालय के अंदर तथा जसोईया मोड़ से भरथौली जानें के रास्ते में कई मिठाई की फैक्ट्रीयाँ संचालित है जहाँ कई तरह के रसगुल्ले, लडडु, सोन पापड़ी, मिल्क केक, डोड़ा वर्फी का व्यापक पैमानें पर निर्माण कर जिला मुख्यालय के तमाम होटलों, ढ़ाबों सहीत जिले के दुर – दराज के प्रखंडो में संचालित दुकानों में बाहनों के द्वारा थोक व्यापारी के द्वारा पहुँचा दिए जाते हैं। खुदरा दुकानदार इन मिठाईयों को ऊँच्चे दामों पर गाहकों को विक्री करते हैं। सोन पापड़ी, मुखदल में चना का बेसन की जगह अरवा चावल का आँटा बनाकर लाल -पीला रंग मिलाकर बनाया जा रहा है। मिल्क सेक, डोड़ा बर्फी में नहीं बिकनें वाली मिठाईयों के चुरा में गुड़ एवं चीनी, सुज्जी, मैदा, नकली खोआ मिलाकर रैपरों में लपेटकर पुनः दुकानदारों के काउन्टर सजाये जा रहे हैं ।
इतना ही नहीं जरा किराना दुकान पर तो जाकर तो देखें । सर्वोतम, स्वागतम्,आर्शीबाद के ब्राँड़ नाम से मिलावटी आँटा बेचा जा रहा है । इनमें पत्थर के चुर, अरवा चावल के पिसान मिलाये जा रहे हैं। गर्मा -गरम रोटी खा लिए तो खिला जायेगा । लेकिन जहाँ देर हुई तो तोड़े नहीं टुटेगी । बोतलों में बंद सरसो के तेल का तो पुछना नहीं है कि क्या मिलाया गया है । लेकिन इन फार्चुन, सपन, पंछी, सलोनी, तीर छाप नाम से बिक रहे सरसो के तेल में जब शब्जी बन रही हैं, तो स्वाद ही नहीं है। हल्दी के पाउड़र से दाल एवं शब्जी में पिलापन ही नहीं आता है। डब्बा बंद गोल्डी, एम डी एच, एम डी एम, अजय, स्वस्तीक, आधुनिक नामों के ब्रांडेड मशालों का तो अलग ही रुतवा है । न तो स्वाद की गारंटी और न स्वास्थ्य की गारंटी । आखिर कौन जवाबदेह होगा जो मिलावटी एवं नकली खाद्य पदार्थों पर रोकथाम कर सके। ड्रग इंस्पेक्टर या सरकारी अस्पतालों में पदस्थापित स्वास्थ्य निरीक्षक या चिकित्सक क्या इसपर अंकुश लगा पायेंगें ? जिले में तैनात जिलाधिकारी सर्वेसर्वा हैं।उन्हें तो जनता के स्वास्थ्य की चिंता तो जरूर करनी चाहिए । अन्यथा सब गोलमाल है, भाई गोलमाल है।