साधन संपन्न दलित लोगों को आरक्षण क्यों?

नवादा से डीके अकेला


देश के सुप्रीम कोर्ट पिछले कुछ महीनों से लगातार काफी चर्चा में अपने क्रिया कलापों के लिए अग्रिम कतार में खड़ा रहा है। सुप्रीम कोर्ट के पिछले दिनों के कुछ जनविरोधी या जनहितैषी फैसले ने काफ़ी मशहूर चर्चा का विषय बना दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कल ही ठीक अपने एक अजूबे फैसले ने आज पूरे देश को हिलाकर जबर्दस्त चर्चा का विषय बन गया है। ज्ञात हो कि सुप्रीम कोर्ट में क्रीमी लेयर और आरक्षण को लेकर सुनवाई के दौरान कल शुक्रवार को पिछड़े वर्गों के भीतर आर्थिक और शैक्षणिक रूप से उन्नत व सबल परिवारों के बच्चों को आरक्षण का लाभ लगातार दिए जाने पे एक अहम सवाल उठाया,जो सबसे बेहद सोचनीय और अनुकरणीय है। न्यायमूर्ति बी बी नाग़रतना और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की संयुक्त पीठ ने कहा कि अगर माता – पिता शिक्षा या आर्थिक रूप से मजबूत स्थिति में पहुंच गए हैं। माता -पिता आई ए एस या सरकारी अधिकारी हैं, तो उनके बच्चों को आरक्षण की क्या जरूरत है, उन्हें ही क्यों मिलना चाहिए ? आई ए एस पदाधिकारी के बच्चे ही सिर्फ आरक्षण लेते रहेंगे तो उसी समाज के अन्य जरूरतमंद बच्चों को भटकने या पिछड़ने के अलावा दूसरा क्या विकल्प है ? असली उतराधिकारी लोग आज सरकार व संविधान प्रदत्त सभी सुविधाओं से पूर्णतः बंचित क्या नहीं हो जाएंगे ?
द्वय उक्त न्यायमूर्ति की संयुक्त पीठ ने साफ़ कहा कि ऐसे बच्चों को आरक्षण से अब जरूर बाहर निकालना ही चाहिए।शिक्षा और आर्थिक सशक्तिकरण के साथ ही सामाजिक गतिशीलता का पदार्पण होता है। अगर अगली पीढ़ी भी आरक्षण मांगती रहेगी, तो फिर समाज डूबी कूपमण्डूक के समंदर से बाहर कदापि नहीं निकल सकता है। कड़वी सच है, जिससे इंकार करना किसी भी कीमत पर नहीं किया जा सकता है। संगीन मामले में पारदर्शिता को प्राथमिकता लेना चाहिए।
विदित हो, कर्नाटक हाईकोर्ट के पीठ के एक गंभीर फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें याचिकाकर्ता को आरक्षण से बाहर रखने के ऐतिहासिक फैसले को बिल्कुल सही, संवैधानिक एवं कानून सम्मत भी सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश ने अपने कल के फैसले में बताया है, क्योंकि याचिकाकर्ता के माता व पिता दोनों ही राज्य सरकार के कर्मचारी हैं,जो सर्वविदित है। आखिरकार कोर्ट ने इस याचिका पर नोटिस जारी किया।
कर्नाटक हाईकोर्ट मामला : – कर्नाटक के पिछड़े वर्गों की सूची में इस समुदाय को श्रेणी -2A के तहत रखा गया है। इस समुदाय के युवक का चयन कर्नाटक पावर ट्रांसमिशन कॉरपोरेशन लिमिटेड में सहायक अभियंता के पद पर आरक्षित श्रेणी के तहत हुआ। जिला जाति और आय सत्यापन समिति ने यह निष्कर्ष निकालते हुए कि यह युवक बिल्कुल क्रीमी लेयर में आता है। इसके माता व पिता दोनों सरकारी कर्मचारी हैं एवं उनकी संयुक्त आय निर्धारित क्रीमी लेयर की सीमा लांघ कर काफ़ी अधिक थी। समिति ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले के आलोक में उसे जाति वैधता प्रमाण पत्र देने से साफ़ इंकार कर दिया है।
द्वय न्यायमूर्ति ने फैसले में कहा :
मूलतः शैक्षणिक और आर्थिक सशक्तिकरण के साथ- साथ सामाजिक दायित्व,कर्तव्यनिष्ठा व गतिशीलता भी देश-समाज में आती है। तो फिर, अगर ऐसे बच्चों के लिए आरक्षण की मांग बेशर्मी से की जाती है,तो फिर हम सब इस कुचक्र से कभी बाहर निकल पाएंगे। अगर छात्र छात्राओं के माता -पिता अच्छी नौकरियों में हैं तो ऐसे घरों के आरक्षण के दायरे से ऐसे बच्चों को खुद बाहर हो जाना चाहिए। अगर वो अपने ही समाज के अन्य पिछड़े वर्गों के यह त्याग या कुर्बानी देना चाहते हैं तो इससे क्या आपके समाज का भलाई छोड़कर क्या बुराई अथवा हानी हो सकता है।