पटना संवाद सूत्र ख़बर सुप्रभात समाचार सेवा
बिहार में कानून का राज, सबका साथ सबका विकास जैसे जुमले पढ़ने वाली जदयू क्या आज तानाशाह के रास्ते पर चल पड़ा है या फिर कोई और सियासत है? यह आम मानस में चर्चा हो रही है। जदयू विधायक अनंत सिंह को पार्टी से छः साल निकालने और विधानसभा से सदस्यता रद्द करने का

सिफारिशी आखिर क्या संदेश दे रहा है यह एक गंभीर विषय है। जदयू के संविधान के अनुच्छेद 19 के अनुसार किसी भी विधायक पर कारवाई करने के लिए सिधे राष्ट्रीय अध्यक्ष अनधिकृत हैं नकी प्रदेश अध्यक्ष। लेकिन विधायक अनंत सिंह के विरुद्ध अभी तक जो कारवाई हुई है वह प्रदेश अध्यक्ष उमेश कुशवाहा द्वारा किया गया कारवाई है। ऐसे में अब सवाल उठना लाजिमी है कि क्या प्रदेश अध्यक्ष उमेश कुशवाहा पार्टी के संविधान से ऊपर हैं? यदि नहीं तो फिर प्रदेश अध्यक्ष कारवाई कर क्या संकेत दे रहे हैं? आखिर उमेश कुशवाहा का यह कारवाई पार्टी में तानाशाही कहा जायेगा या फिर कोई और सियासत, चुके उमेश कुशवाहा के इस मनमानी और कारवाई पर शिर्ष नेतृत्व का चुप्पी भी अबूझ पहेली बना हुआ है। दुसरा सवाल की विधायक अनंत सिंह को सोकोज तक नहीं किया गया और सीधे कारवाई का पत्र थमा दिया गया यह भी एक तानाशाही का ही उदाहरण है। लाख टके का एक यह भी सवाल है कि जब अनंत सिंह बार बार चिल्ला रहे हैं कि जब वे स्वयं जदयू से चुनाव लड रहे थे तो नीरज कुमार भी उनका विरोध कर रहे थे और तमाम पार्टी नेतृत्व उस वक्त चुप्पी साधे हुए था। अनंत सिंह का इस आरोप का जदयू के वरिष्ठ नेता व केन्द्रीय मंत्री ललन सिंह भी मिडिया के सामने कैमरा में मुहर लगा चुके हैं। अब देखना है कि विधानसभा अध्यक्ष डॉ० प्रेम कुमार विधानसभा के सदस्यता समाप्त करने का फैसला पर क्या निर्णय लेते हैं? निर्णय लेते समय वे जदयू के संविधान के अनुच्छेद 19 का अध्ययन करेंगे और सोकोज का नियम का पालन हुआ या नहीं यह भी देखेंगे कि जदयू के तानाशाही और सियासत पर मुहर आंख बंद कर लगा देंगे? पुरे मामले को लेकर प्रदेश में सियासी पारा के बीच सभी का नज़र फिल वक्त विधानसभा अध्यक्ष डॉ० प्रेम कुमार पर भी टीका हुआ है।