आलोक कुमार के कलम से
डॉ. श्री कृष्ण सिंह जिन्हें पूरा बिहार प्यार और सम्मान से ‘श्री बाबू’ कहता है। वे बिहार के पहले मुख्यमंत्री थे और अपनी अंतिम सांस 1961 तक इस पद पर रहे। आज हम जिस बिहार को जानते हैं—चाहे वो बरौनी रिफाइनरी हो, एच.ई.सी. (HEC) रांची हो, या बोकारो स्टील सिटी—ये सब उन्हीं की दूरदर्शी सोच का नतीजा हैं।
वे सिर्फ एक राजनेता नहीं, एक विद्वान थे। उनके पास 20,000 से ज्यादा किताबें थीं और वे रात-रात भर पढ़ते थे।
यहाँ उस महान प्रशासक और जमींदारी प्रथा को खत्म करने वाले क्रांतिकारी के बारे में एक पोस्ट है।
श्री बाबू: वो पहला हस्ताक्षर, देवघर का दरवाजा और ‘बिहार केसरी’ की दहाड़!! आजादी के बाद देश में कई मुख्यमंत्री बने, लेकिन श्री बाबू जैसा विजनरी शायद ही कोई था। उनके शासनकाल में बिहार को देश का सबसे अच्छे प्रशासन वाला राज्य माना जाता था।
श्री बाबू की वो बातें जो इतिहास बदल देती हैं:
ज़मींदारी उन्मूलन
यह उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि थी।
वे खुद एक भूमिहार ब्राह्मण थे, लेकिन उन्होंने सबसे पहले जमींदारी प्रथा को खत्म किया।
जब जमींदारों ने इसका विरोध किया और जान से मारने की धमकियां दीं, तो उन्होंने विधानसभा में कहा— “मैं गरीबों के आंसू पोंछने आया हूं, अमीरों की तिजोरियां भरने नहीं।” बिहार ज़मींदारी खत्म करने वाला देश का पहला राज्य बना।
देवघर मंदिर प्रवेश (समाज सूधार)
1953 में, दलितों को देवघर के बैद्यनाथ धाम मंदिर में घुसने की इजाजत नहीं थी।
श्री बाबू खुद दलितों की भीड़ के साथ मंदिर पहुंचे। पंडा-पुरोहितों ने उन पर लाठियां चलाईं, वे घायल हुए, लेकिन वे दलितों को लेकर ही गर्भगृह में गए। उन्होंने धर्म को छुआछूत से आजाद कराया।
आधुनिक बिहार की नींव:
आज के झारखंड के बड़े-बड़े उद्योग (टाटा को छोड़कर) श्री बाबू की देन हैं।
सिंदरी खाद कारखाना, बरौनी रिफाइनरी, दामोदर घाटी परियोजना—ये सब उन्हीं के कार्यकाल में बने। वे बिहार को भारत का ‘रूर’ (औद्योगिक केंद्र) बनाना चाहते थे।
राम-लखन की जोड़ी:
उनके और अनुग्रह नारायण सिन्हा (बिहार विभूति) की दोस्ती मिसाल थी। वे मुख्यमंत्री थे और अनुग्रह बाबू उपमुख्यमंत्री। दोनों में कभी मतभेद नहीं हुआ। इसे बिहार की राजनीति का स्वर्ण युग कहा जाता है।
वे बिहार के ‘लौह पुरुष’ थे।
