मदनपुर से सुनील कुमार सिंह की रीपोर्ट
” हरितालिका ” का शाब्दिक अर्थ होता है – हरित यानि हरण, तालिका यानि सखी । यानि कि जिसका सखी द्वारा हरण कर लिया गया हो । शास्त्रों के अनुसार ‘हरितालिका ‘ व्रत की पुरी कथा इसप्रकार है कि एकबार माता सती नें भगवान शिव को अपना पति के रूप में पानें के लिए हिमालय के गांगा तट पर बाल्यकाल में अद्योमुखी होकर घोर तप किया | उन्होनें अन्न का त्याग कर दिया । सिर्फ सुखी पतियाँ खाकर जीवन बितानें लगी । बाद में सिर्फ हवाओं के सहारे प्राण वायु लेकर तपस्या चालु कर दी । यह सब देखकर पिता हिमाचल को काफी चिंता सतानें लगी ।
एक दिन महर्षि नारद नें विष्णु से माता पार्वती का विवाह का प्रस्ताव उनके पिता राजा हिमाचल को दिया । राजा हिमाचल नें नारद जी के इस प्रस्ताव को सहर्ष स्वीकार कर लिया और यह सुखद सामाचार अपनी पुत्री पार्वती को भी बताया । यह सुनकर पार्वती काफी उदास रहनें लगी । अपनी बेदना को पार्वती नें अपनी प्रिय सखी को बताया । सखी नें पार्वती को रात्री में चुपचाप लेकर घनघोर जंगल में चली गयी, जहाँ तक कोई आता – जाता नहीं था । यहाँ एक गुफा में माता पार्वती नें और कठिन तपस्या शुरू कर दी । शास्त्रों के अनुसार पार्वती के इसी रूप को नवरात्रा में ‘ शैलपुत्री ‘ के रूप में पूजा जाता है। फिर भादो शुक्ल पक्ष के तृतीया तिथी को हस्त नक्षत्र में बालु का शिवलिंग बनाकर पार्वती नें पूजन प्रारंभ कर दिया । रात्री भर जागरण किया । तब जाकर भगवान शिव प्रसन्न हुए और पार्वती को अपनी अर्द्धांगिनी बनाना स्वीकार किया । शास्त्रों में ऐसी मान्यता है कि जो स्त्रियाँ भादो शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को हस्त नक्षत्र में हरितालिका तीज व्रत को करती हैं उनकी पति की उम्र लंबी होती है । तथा जो कुँआरी कन्यायें यह व्रत करती हैं तो उन्हें मनोयोग वर की प्राप्ति होती है ।

