बिहार विधान सभा अध्यक्ष ने सर्वोच्च न्यायालय की अवमानना कर लोकतंत्र को कलंकित किया

अम्बुज कुमार खबर सुप्रभात सामाचार

ओबरा विधान सभा क्षेत्र से वर्ष 2010 में हुए मेरे निर्वाचन को अवैध घोषित करने हेतू तत्कालीन जद (यू) प्रत्यासी प्रमोद चंद्रवंशी उच्च न्यायालय पटना में चुनाव याचिका दाखिल किया था। प्रमोद चंद्रवंशी का आरोप था कि मैंने आई.जी. को इस्तीफा सौंपा था और उसे डी.आई.जी. ने स्वीकार किया है। इसलिये मेरा इस्तीफा सही नहीं है और अभी भी मैं सरकारी सेवा में माना जाउंगा। उच्च न्यायालय पटना में मैंने अपनी वकालतत खुद किया और माननीय न्यायालय को बताया कि R.P.Act की धारा 101 के तहत चुनाव याचिका में सेवा संबंधी मामलों की सुनवाई नहीं हो सकती। और यदि थोड़ी देर के लिये यदि मान भी लिया जाये कि चुनाव याचिका में सेवा संबंधी मामलों की सुनवाई की जा सकती है तो भी यदि कोई कर्मी अपना इस्तीफा चाहे जिसे भी सौंपे परंतु उसे स्वीकार करने का अधिकार Appointing Authority को ही होता है। चूँकि पुलिस सब इंस्पेक्टर का Appointing Authority डी.आई.जी. होते हैं इसलिये मेरे इस्तीफे को आई.जी. ने डी.आई.जी. को भेजा और वे इसे स्वीकार कर लिये। यदि माननीय न्यायालय चाहे तो इसकी पुष्टि पुलिस विभाग से कर सकती है। परंतु माननीय उच्च न्यायालय पटना ने 25 अप्रैल 2014 को मेरे विरूद्ध फैसला सुनाते हुए मेरी सदस्यता को अवैध घोषित कर दिया। माननीय उच्च न्यायालय के आदेश के आलोक में बिहार विधान सभा सचिवलाय ने 21 मई 2014 को बिहार विधान सभा से मेरी सदस्यता रद्द कर दी। माननीय उच्च न्यायालय पटना के आदेश के खिलाफ मैंने सर्वोच्च न्यायालय दिल्ली में अपील दाखिल किया और सर्वोच्च न्यायालय ने 18 सितंबर 2015 को पारित अंतरिम आदेश में चुनाव याचिका में सेवा संबंधित मामलों की सुनवाई को ही गलत माना और उच्च न्यायालय पटना के आदेश पर पूर्ण रोक लगा दिया। माननीय सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के आलोक में बिहार विधान सभा सचिवलाय ने 26 दिसंबर 2015 को बिहार विधान सभा से मेरी सदस्यता बहाल कर दी। करीब 11 वर्ष बाद जब 28 जनवरी 2026 को सर्वोच्च न्यायालय में लंबित कांडो की सुनवाई चल रही थी तो सर्वोच्च न्यायालय के माननीय न्यायाधीशों की बेंच ने मेरे केस के संबंध में कहा कि “Consequently, the civil appeal is dismissed as infructuous” अर्थात अब यह केस अब निष्प्रभावी (निरर्थक) हो गया है और इसकी सुनवाई करने का कोई औचित्य नहीं है, इसलिये खारिज किया जाता है। अर्थात सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 18 सितंबर 2015 को पारित अंतरिम आदेश ही अंतिम आदेश रह गया। इसका मतलब यह नहीं है कि सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालय पटना के आदेश को प्रभावी कर दिया। परंतु बिहार विधान सभा के माननीय अध्यक्ष ने सर्वोच्च न्यायालय के आदेश को गलत तरीके से प्रस्तुत कर बिहार विधान सभा से मेरी सदस्यता रद्द करने का पूर्णतः गलत आदेश निकाल दिया। उच्च न्यायालय एवं सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता एवं कानूनी जानकार एवं संवैधानिक समझ रखने वाले लोगों ने माननीय न्यायालय एवं विधान सभा अध्यक्ष के अधिसूचना का समीक्षा करने के बाद कहा कि अध्यक्ष की अधिसूचना सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का विकृतिकरण एवं गुमराह करने वाला (Misleading of Court) है। यह एक ऐसा कृत है जो न्यायालय की अवमानना के सीमा पर है। यह अधिसूचना एक शासकीय अधिसूचना है जो राजकीय गजट में प्रकाशित होती है। 3 दिन बीत जाने के बाद भी इसकी प्रति आज तक मुझे नहीं मिली परंतु प्रमोद चंद्रवंशी एवं तमाम समाचार एजेंसियो को तत्काल भेज दी गयी। इसका मतलब यह अधिसूचना शासकीय नहीं बल्कि जानबूझकर सार्वजनकि रूप से मेरी छवि बदनाम करने की थी। महामहिम राज्यपाल से हम माँग करते हैं कि सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के विकृतिकरण पर संज्ञान ले। साथ ही सर्वोच्च न्यायालय से भी आग्रह करते हैं कि आपके आदेश को गलत तरीके से पेश कर न्यायालय की गरीमा को कलंकित किया गया है। इसलिये स्वतः संज्ञान लेते हुए विधान सभा अध्यक्ष पर कारवाई करे।