डीके अकेला के कलम से
आज अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस है। आज ही मशहूर समाजवादी चिंतक मधु लिमये की 103 वीं जयंती भी। समाजवादी समागम की दिल्ली इकाई ने शाम को चर्चा का एक शानदार आयोजन किया। राजेंद्र भवन के मीटिंग हाॅल में। शानदार यूं कि तैयारी अच्छी थी। बेहतरीन ग्राउंड वर्क। हाॅल खचाखच भरा हुआ। एक भी कुर्सी खाली नहीं। कुछ को तो खड़ा रहना पड़ा। कुछ ज़मीन पर बैठे।

उससे भी बेहतर यह कि दर्शक/श्रोता दीर्घा में दो तिहाई से ज़्यादा औरतें। हर तबके की। हर समूह की। हर तरह के काम धंधे करने वालियां। हिंदू भी। मुसलमान भी। दलित भी। मजदूर भी। घर और बाहर दोनों जगह काम करने वालियां। घर बनाने/संवारने वालियां। बच्चों वालियां। साड़ी में। सूट में। जिंंस-टी शर्ट में। पैंट शर्ट में। इक्के दुक्के वेस्टर्न और भारतीय मिलेजुले रूचिकर कलात्मक परिधान में भी। बुर्के में भी। हिजाब में। नकाब में। दुपट्टे में। सर पर आंचल में। बिना दुपट्टे/आंचल/नकाब/हिजाब के भी। कुुछ बहुत पढ़ी लिखी विद्वान, कुछ ग्रेजुएट, कुछ पोस्ट ग्रेजुएट, कुछ शोधार्थी, कुछ लेखक भी, कुछ कम पढ़ी लिखी, कुछ सिर्फ अक्षर ज्ञान तक, कुछ बिल्कुल ही नहीं पढ़ लिख सकने वाली भी।
जुटान देखकर मन गदगद हो गया। मांंओं के साथ आए बच्चों की धमा चौकड़ी ने ज़िंदगी के कुछ और उम्मीदी रंग जोड़े। बहुत दिनों बाद ऐसी जमघट का हिस्सा बनी जो नाउम्मीदी और नायक़ीनी के इस दौर में उम्मीद की रौशनी दे। आयोजकों के लिए दिल से मुबारकबाद। शुक्रिया भी…बहुत बहुत शुक्रिया।
मंच पर कुुल 10 जन थे। पूर्व घोषित वक्ता थे। पहले से अघोषित वक्ता भी बोलने के लिए बुलाए गए। माननीय मंचीय और बोलक मर्दों की संख्या पहले से तय मर्दों से ज़्यादा हुई तो और कुर्सी डालकर उन्हें accommodate किया गया। मर्दों के 100% आरक्षित इस मंच से सभी मर्दों ने बढ़िया बोला। बहुत बढ़िया बोला। मंच औरतों के लिए 100% वर्जित रहा। इस वर्जना का 100 भक्तिभाव से अमल भी हुआ। 100 % अमल हुआ। कोई भी औरत इस मर्दीय मंच पर न आए इस संकल्प का 100% अनुपालन।
सभी मर्द अच्छा बोले। कुछ तो बहुत ही अच्छा बोले। जो बोलते ही रहते हैं तो अच्छा ही बोलेंगे। कुछ हमेशा ही अच्छा बोलते हैं। आज भी अच्छा बोले। योगेंद्र यादव विषय पर रहें। विषय था 21वीं सदी में लोकतंत्र, मजदूर आंदोलन और समाजवाद। अच्छा विषय था। बिल्कुल वक़्त के अनुकूल। सहज सरल भाषा में सबको समझ में आने वाली जुबान में गम्भीर बातें। विषय पर पूरी तरह सिर्फ योगेंद्र ही बने रहें। पर सभी मर्दों ने interesting बोला। काम की बातें। कुछ यादें। कुछ अनुभव। कुछ आपबीती। कुछ जगबीती। जो भी बोला, मर्दों ने अच्छा बोला। मर्दों ने ही बोला। बोलकों में सिर्फ मर्द ही मर्द। अध्यक्ष भी मर्द। संचालक भी मर्द। मंच 100% मर्दों के कब्जे में। हां, एक दो ने बहनों का जिक्र कर महिलाओं के वजूद को स्वीकारा ज़रूर।
औरतें सुनने के लिए थीं। अच्छे से सुना। सुनना ही उनका काम है। बिना शोर शराबे के। बिना बातचीत किए। बिना सवाल के।बिना बोलने की ख़्वाहिस के। सदियों से, शायद आदिकाल से वे सुनती ही आई हैं। उन्हें सुनना ही आता है। लोहिया ने कहा था अवसर दो। काबिलियत आ जाएगी। मर्दों को बोलने का अवसर मिला। उनमें बोलने की काबिलियत आई। औरतों को सुनने का अवसर मिला। उनमें सुनने की काबिलियत आई। यही उनका योगदान है कि वे युग युग से सुनती आई हैं। बिना बोले। वैसे भी बोलने के लिए मर्द हैं न! क्या ज़रूरी है बोलना?
आज से करीब तीस बतीस साल पहले एक कविता लिखी थी, …बेटी बोल…तू राग भैरवी बोल…. याद आ गई। थोड़ी-बहुत मक़बूल भी हुई। किशन पटनायक को बहुत पसंद आई थी। कुलदीप नैयर और रघुवीर सहाय को भी। किशन जी तो जब मिलते कहते वो कविता सुनाओ बेटी बोल…। अब वे लोग नहीं रहे।
खैैर!आयोजन सम्पन्न हुआ। एक मर्द ने ही धन्यवाद ज्ञापन किया। तो, समाजवाद बबुआ मर्द लोग ले आई।
उनका पीछे पीछे चुपेचाप चलिहें लुगाई।
