नवादा से डीके अकेला की रीपोर्ट
नवादा जिले के बहुचर्चित नाबालिग से दुष्कर्म के मामले में पटना हाईकोर्ट से बाइज्जत बरी हुए नवादा के पूर्व श्रम राज्यमंत्री राज बल्लभ के खिलाफ बिहार सरकार ने पुनः सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने से मुश्किलें एक बार फिर से बढ़ती नजर आ रही है। बिहार सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की एसएलपी जो दो सप्ताह बाद अगली सुनवाई करेगी। बिहार

सरकार ने नाबालिग से दुष्कर्म मामले में पटना हाईकोर्ट के फैसले में बरी करने के फैसले के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देते हुए विशेष अनुमति याचिका (एस एल पी) दाखिल की है। पिछले शुक्रवार को शीर्ष अदालत में इस याचिका पर सुनवाई हुई, जिसके बाद कोर्ट ने इस मामले को दो सप्ताह बाद अगली सुनवाई के लिए ही सूचीबद्ध कर दिया है।सरकार की इस चुनौती के बाद करीब एक दशक पुराना बहुचर्चित मामला एक बार फिर जिंदा भूत बनकर कानून तथा राज नीतिक चर्चा के केंद में आ गया है। पिछले शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट में हुई प्रारंभिक सुनवाई के बाद अब दो सप्ताह बाद होने वाली अगली सुनवाई पर सिर्फ नवादा ही नहीं,बल्कि पूरे प्रदेश व देश की नजरें टिकी हुई हैं।
पूरा मामल और घटनाक्रम क्या है, इस पर गौर करें : –
यह बहुचर्चित मामला 06 फरवरी 2016 को सामने आया था,जिसके बाद 09 फरवरी 2016 को बिहार सरकार के पहल पर ( FIR) प्राथमिकी दर्ज की गई थी। उस समय नवादा के विधायक रहे राजबल्लभ प्रसाद ने बाद में न्यायालय में आत्म समर्पण किया एवं नवंबर 2016 से ही जेल में रहे। पटना की विशेष अदालत ने 15 दिसंबर 2018 को उन्हें दोषी ठहराते हुए 21 दिसंबर 2018 को आजीवन काराकास की सजा सुनाई थी। हालांकि, निचली अदालत के इस फैसले के विरुद्ध अपील कर सुनवाई करते हुए अगस्त 2025 में पटना हाईकोर्ट ने साक्ष्य के आधार पर ही राज बल्लभ यादव को बरी कर दिया था।
सुप्रीम कोर्ट में बिहार सरकार ने रखी तीन मुख्य दलीलें : –
- पीड़िता की गवाही की विश्वनीयता : राज्य सरकार ने तर्क दिया कि पीड़िता का बयान पूरी तरह विश्वसनीय है यदि गवाह भरोसेमंद हो, तो केवल अन्य परिस्थितियों के आधार पर इसे खारिज नहीं किया जा सकता है।
- मैट्रिक प्रमाण पत्र में उम्र का निर्धारण : – सरकार ने कहा कि पीड़िता की उम्र साबित करने के लिए मैट्रिक का प्रमाण पत्र रिकार्ड पर उपलब्ध था, जिसे आरोपी पक्ष ने फर्जी नहीं बताया था। ऐसे में उस दस्तावेज की अनदेखी कर केवल मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर यह फैसला देना उचित ही नहीं, बल्कि घोर मजाक है।
- मेडिकल रिपोर्ट पर भी आपत्ति : – बिहार सरकार ने मृत मुर्दा को उखाड़कर सवाल उठाए कि जिस महिला डॉक्टर की मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर हाइकोर्ट ने उन्हें राहत दी,वह कोर्ट के सामने विधिवत पेश ही नहीं की गई थी और नहीं तो वह कोर्ट रिकार्ड का हिस्सा थीं।
