खबर सुप्रभात समाचार सेवा
भारत में अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति के व्यक्तियों को कोई दुसरा पक्ष अपमानित नहीं कर सके इसके लिए भारतीय संविधान में सुरक्षा के कई उपाय किए गये हैं। भारत का संविधान लागु होते ही वर्ष 1952 से ही SC / ST एक्ट की चर्चा शुरू हो गयी । वैसे भारतीय संसद द्वारा 1 1 सितम्बर 1989 को यह अधिनियम पारित किया गया और 30 जनवरी 1990 को पुरे भारत में ( जंबु – काश्मिर को छोड़कर ) लागु कर दिया गया ।
इस कानून में अनुसूचित जाति एवं जनजाति की श्रेणी में आनें वाले व्यक्तियों के साथ कोई जातिगत भेद -भाव न हो, किसी भी धार्मिक स्थल मंदिर, स्कुल, सार्वजनिक जगह पर जानें से नहीं रोका जाय, इनके परिसंपतियों को कोई जवरदस्ती नहीं छिनें, मार – पिट, गाली – गलौज नहीं करे, इनकी महिलाओं के साथ कोई शारीरिक शोषण नहीं हो, इनसे कोई जवररस्ती बेगार अथवा मजदुरी नहीं कराये आदि तमाम सुरक्षा के विन्दुबार मानक जोड़े गये हैं। अगर कहीं ऐसा होता है तो इस समुदाय का व्यक्ति संवंधित थानें या न्यायालय में जाकर बाद दर्ज करवा सकते हैं। आरोपित व्यक्ति को तुरंत पुलिस पकड़कर जेल भेज देती है। पिड़ीत पक्ष को प्राथमिकी दर्ज होते ही 50 से 80 हजार रुपये तत्काल सरकार से प्राप्त होते हैं। डीएसपी रैंक के पदाधिकारी को ऐसे मुकदमों की जाँच का जिम्मा दिया गया है। तीस दिनों के भीतर ही चार्ज सीट न्यायालय में भेजनें का प्रावधान है। आरोपित को अग्रिम जमानत नहीं मिलती है। उसे अपनें – आप को निर्दोष सावित करनें का सबुत न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करना पड़ता है।
बाद के सरकारों नें संविधान के अनुच्छेद 17 और 46 में 2015 और 2018 में संशोधन कर इस SC / ST कानून को और व्यापक बना दिया है। इसमें मिलनें वाली राशि का दायरा भी चार लाख से बढ़ा कर तीन गुणा कर दिया गया है।
जबसे SC / ST कानून में सहायता की राशि काफी बढ़ा दी गयी है, तभी से इसका दुरुपयोग होनें लगा है। लोग किसी को नीचा दिखानें, परेशान करनें, निजी दुश्मनी साधनें, तथा मोटी राशि का आर्थिक लाभ पानें का हथकंडा बना डाला है। अब FIR होते ही चार लाख, तीस दिनों के भीतर चार्ज सीट होते ही चार लाख एवं न्यायालय में केस ट्रायल होते ही चार लाख की राशि जो वादी को मिलनें लगे हैं। अगर केश झुठा भी सावित हो जाता है तो वादि द्वारा लिए गये राशि की न तो वसुली ही की जाती है और न फर्जी केश कर किसी को अकारण जेल भेजवानें का मुकदमा ही होता है। सबकुछ सत्यता जाननें के बाद भी न्यायलय ऐसे फर्जी केस करानें वालों से न तो ली गयी गशि ही वसूल पाते हैं, और न तो 2 1 1 के तहत उल्टा केस ही कर पाते हैं । न्यायालय भी किसी न किसी के भय से अपनी कलम एवं जुबान बंद रख लेती है। ऐसा ही एक मामला औरंगाबाद के व्यावहार न्यायालय के अंदर अम्बा थाना कांड़ सं. 22/2023 में देखनें को आया है। वादी द्वारा कराया गया SC / ST ACT को न्यायालय नें फर्जी करार तो दे दिया है । लेकिन फर्जी केस के एवज में प्राप्त राशि की वसूली तथा जान बुझकर किसी को परेशान एवं प्रताड़ित करनें के एवज में 2 1 1 के तहत मुकदमा ही दर्ज कर रही है। नतीजन SC / ST ACT के स्वरूप, सरकार एवं न्यायालय पर सवालिया निशान खड़ा हो चुका है। पुछता है भारत ?

