आखिर बंदुक से निकलनें वाली सत्ता का हुआ अंत, लेकिन लिल गयी 5 4 बेगुनाहों की जिंदगियाँ

सुनील कुमार सिंह खबर सुप्रभात समाचार सेवा


माओ का नारा था कि सत्ता का रास्ता बंदुक की नली से होकर निकलती है । इसी को ध्येय वाक्य बनाकर मदनपुर के क्षेत्रों में 19 70 की दशकों में माओबाद का बीजारोपण किया गया था । माओबाद का पाठशाला बना था – चाल्हो जोन । इसी पाठशाला के शिक्षक रहे थें – रामाधार सिंह, जगदीश मास्टर, प्रमोद मिश्रा, नथुनी बढ़ई, पंड़ित

शिराजुद्दीन । इन लोगों नें नक्सल आंदोलन के संस्थापक कानु संयाल तथा चारू मजुमदार के बिचारों को आगे बढ़ानें का काम किया था ।,,,,,,, ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, नक्सलबाद का इतिहास,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,1967 में बंगाल के नक्सलबाड़ी नामक जगह से चाय बगानों के मालिकों के खिलाफ उठा आन्दोलन मजदुरों एवं आदिवासियों को संगठित करते हुए जमिंदारों के खिलाफ उठ खड़ा हुआ । धीरे – धीरे भारत के कई राज्यों में अपना सामानांतर सत्ता कायम कर लिया ।1969 में इन दोनों नेताओं नें कम्यूनिष्ट पार्टी (मार्कस वादी ) से अलग होकर कम्यूनिष्ट पार्टी (मार्कस वादी – लेलिनवादी) का गठन कर लिया । चारू मजुमदार इस आन्दोलन के बैचारिक नेता बनें । इन्होनें आठ किताबों को लिखा, जो कि इस आन्दोलन का आधार बना । कानु सन्याल नें इन्हीं नीतियों को आगे बढ़ाया तथा एक विशाल नेटवर्क स्थापित कर दिया ।,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
मदनपुर के क्षेत्रों में नक्सलबाद का दुष्परिणाम
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1970 के दशकों से ही पुरे मदनपुर के क्षेत्रों में नक्सलबाद अपना फन फैलानें लगा था । इसी दशक में उत्तर कोयल नहर की खुदायी का काम शुरू हो चुका था । ठिकेदारों से लेवी, केन्दु पत्ता तोड़ाई से लेवी से वसुले गये राशि से हथियार और गोला – बारूद खरीदकर नक्सली संगठन मजबुत बन चुके थें। जल, जंगल और जमीन को बचानें तथा पिछड़े, आदिवासी एवं दलितों की लड़ाई जमिंदारों एवं सामंती वर्गों से लड़नें की बात कहकर इन्हें गोलबंद किया । भोजन और संरक्षण जंगल तटीय लोगों से मिलनें लगा । जमिंदारों की जमीनों पर लाल झंड़ा गाड़कर खेती करनें से रोका गया । इनके द्वारा जमिंदारों की जमीन पिछड़े, दलितों एवं वनवासियों में बाँट दिया गया । बदले में जंगल तटिये लोगों से इन नेताओं को भोजन एवं सुरक्षा दी जानें लगी ।
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कैसे शुरू हुआ हत्याओं का सिलसिला
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नक्सलवादियों के द्वारा दहशत फैलानें के लिए सवर्ण समाज के तेज – तर्रार एवं पैसे वालों की हत्या का दौर शुरू हुआ । मदनपुर क्षेत्र में पहली हत्या अलीइमाम मुखिया का औरंगाबाद से अपनें घर कासमा लौटते समय चाल्हो पहाड़ के समीप बेला गाँव के पास कर दिया गया । फिर क्या हत्यायों का सिलसिला ही चालु हो गया । रामपुकार सिंह ( अरथुआ ), भगवान सिंह ( सलैया ), लखन लाल ( जुड़ाही ), शत्रुधन सिंह ( मोखेता ), बबन सिंह, अशोक सिंह सहित सात व्यक्ति ( देवजरा ),केदार सिंह, सुरजा सिंह ( आँजन ), कृष्णा सिंह ( घटराईन । सहित दर्जनों लोगों की हत्या कर नक्सलवादियों नें मदनपुर को एक लाल गलियारा घोषित कर अपनी एकछत्र सामानांतर सत्ता स्थापित कर ली ।
नक्सलियों नें आँजन के सहजपुर एवं सढ़ियार स्थित कचहरी पर हमला करके आँजन के कई राजपुतों की हत्या कर दी, एवं डायनामाईट लगाकर कचहरी को उड़ा दिया । बदले में आँजन के लोगों द्वारा छोटकी छेछानी में सात लोगों की हत्या कर बदला लिया ।
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छोटकी छेछानी का बदला लेनें में ही गयी दलेल चक – बघौरा में 54 निर्दोष लोगों की जान
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छोटकी छेछानी कांड़ का बदला लेनें हेतु माओवादी संगठन अपनें नेतृत्वकर्ता सुबेदार यादव के नेतृत्व में कमजोर राजपुतों को टारगेट बनानें की कवायत शुरू हो गयी थी । दलेलचक – बघौरा के आस – पास एवं उत्तर कोयल नहर के दक्षिण के इलाके में नक्सलियों का दस्ता कुछ अनहोनी करनें की नियत से जमा होने लगे थे । नतीजन खुँटी डीह, लालटेनगंज, चिलमी, जमुनिया, धोवी बाग, सिरोंघा, हसन बार, बादम, आजाद बिगहा सहीत दर्जनों गाँवों के स्त्री – पुरुष एवं बच्चे अपनें घरों में ताला जड़कर पलायन करनें लगे । इसकी भनक मदनपुर के तत्कालिन प्रखंड़ विकास पदाधिकारी शिव बचन सिंह का सूत्रों से मिली । उन्होनें पत्र लिखकर कुछ अनहोनी होनें की सूचना जिला के आलाधिकारियों से लेकर सरकार को दी थी । लेकिन समय रहते कोई कारवाई नहीं हुई । परिणाम हुआ – – दलेल चक – बघौरा सामुहिक हत्या कांड़ ।
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प्रशासनिक विफलता के कारण गयी चौबन निर्दोषों की जानें
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बिडीओ की सूचना पर यदि तत्कालिन सरकार ( विन्देश्वरी दुबे मुख्यमंत्री बिहार, बुटा सिंह केन्द्रिय गृह मंत्री ) समय रहते संज्ञान ले लेती तो दलेल चक – बघौरा कांड़ की घटना नहीं घटती । मदनपुर थानें से महज तीन किलो मीटर की दूरी पर स्थित है दलेल चक – बघौरा गाँव । तारीख 29 मई 1987 की काली मनहुस रात नें दलेल चक – बघौरा मिलाकर कुल 54 जिंदगियों को लिल गया । डेढ़ वर्ष से लेकर तिरासी वर्ष तक के दुधमुंहे बच्चे, पुरुष, महिलायें, बेसहारा बुढ़ा – बुढ़ी को संख्या गिनती में जान गवानी पड़ी । इन्हें दोनों हाँथ पिछे बाँधकर धारदार हथियार पसुली से गला रेतकर हत्या कर दी गयी । इनके घरों को आग लगा कर जला दिया गया । करीब पाँच सौ की संख्या में एकत्र माओवादी एकही समय दोनों गाँवों में घटना को अंजाम दिया तथा छोटकी छेछानी का बदला ले लिए । एम. सी. सी. जिंदाबाद – माओबाद जिंदाबाद का नारा लगाते हुए दक्षिण दिशा में उत्तर कोयल नहर को पार कर बढ़की पहाड़ स्थित जंगल की ओर आराम से चलते बनें । दलेल चक गाँव का बुढ़ा पिपल वृक्ष एवं शहिदों का शीलालेख तथा बघौरा गाँव का बुढ़ा बरगद का पेंड़, कुँआ, गया सिंह के खंडहर मकान में लगा इस घटना के मृतकों की सूचि / स्मारक चुप रहते हुए आज भी बहुत कुछ वयाँ करता है। इस घटना के 39 वर्ष वितने के बाद भी बघौरा गाँव बिजली, पानी, सड़क जैसी बुनियादी सुविधायें से बंचित है। आवादी के नामपर सिर्फ दो – चार दलितों के घर बचे हैं जहाँ के लोग आज भी दबी जुबान में ही 29 मई 1987 की काली शुक्रवार की घटना कहनें को मजबुर हैं।
एक तरफ वर्तमान सरकार 31 मार्च 2026 को पुरे देश से माओबाद समाप्त की घोषणा कर फुले समाती है तो वहीं दुसरी तरफ माओवादी हत्याकांड़ से पिड़ीत गाँवों में बुनियादी सुविधायें का विकास करने से अभी भी गुरेज करती है।