देश के विभिन्न राज्यों से मन्नतें पूरी होने पर पहुंचे वारिसपिया के हजारों भक्तों ने की चादरपोशी, पांडेय गंगौट के मड़ही पूजा सामाजिक समरसता एवं बड़े आस्था का अनूठा अटूट केंद्र

नवादा से डीके अकेला की रिपोर्ट


नवादा  जिले में कौआकोल प्रखंड एवं रूपौ थाना क्षेत्र के सुप्रसिद्ध गांव पाण्डेय गंगौट गांव में मन्नतें पूरी होने पर देश के विभिन्न प्रांतों से आए श्रद्धालुओं ने हजारों हजार की संख्या में वारिसपिया के बताए तथा दर्शाए गए नक्शेकदम एवं मार्ग पर सदैव चलने वाले परमप्रिय भक्त श्री नंदबाबा एवं महंत बाबा की समाधि पर पवित्रता से श्रद्धा,स्नेह,लगन व संकल्प के साथ ही हजारों वारिस पिया के भक्त जनों ने दिल की गहराई से पूजा एवं अर्चना धार्मिक अनुष्ठान के साथ

सादर चादरपोशी की। ज्ञात हो कि देश के सबसे बड़े यूपी के मशहूर देवा शरीफ के बाराबंकी जिले के चर्चित एक महान सूफी संत वारिसपिया के परम अनुयाई एवं समर्पित भक्त पंचवदन सिंह उर्फ महंथ बाबा के नाम से सुविख्यात के उनके धार्मिक गुरु नंदबाबा की समाधि स्थल वाली पांडेय गंगौट मड़ही सिर्फ सामाजिक समरसता की ही नहीं, परन्तु सांप्रदायिक सौहार्द की यह एक बड़े ही अद्भुत अद्वितीय अमिट व अटूट धार्मिक प्रतीक स्थल के रूप में सुप्रसिद्ध है। मड़ही पूजा के महान पवित्र स्थान मानव को मानव की सद्कर्मों की पूजा करने का एक मात्र संदेश देता है। इस मड़ही पूजा हिंदू-मुस्लिम एकता की अटूट एवं अमिट सामाजिक समरसता की बड़ी प्रसिद्धि देश के विभिन्न राज्यों में दूर-दूर तक चारों ओर फैली हुई है। प्रचार-प्रसार बहुत है।
विदित हो कि पांडेय गंगौट मड़ही में दो बार एक कार्तिक मास के द्वितीया और दूसरा आषाढ़ माह के अठारहवीं तिथि को दोनों परम प्रिय बाबाओं की पुण्य स्मृति में आयोजित पूजा में मन्नतें मांगने वाले विभिन्न प्रांतों व सम्प्रदायों के वारिस पिया के भक्तों पहुंचते हैं। पांडेय के गांव में गंगा यमुनी तहजीब के साथ हिन्दू मुस्लिम एकता,दृढ़ विश्वास, आपसी भाईचारा व सामाजिक समरसता की एक संकल्पित त्रिवेणी की तीव्र बहती है।प्रेम की धारा बहने वाली अनवरत श्रोत पाण्डेय गंगौट मड़ही नवादा जिला के मुख्यालय से मात्र 25 कि.मी. नवादा से पूरब कौआकोल से भाया रूपौ मुख्य पथ पर ही अवस्थित है।
वार्षिकोत्सव की शंखनाद प्रसिद्ध ग्रामीणों और बाहरी आगंतुक वारसी प्रेमियों तथा कलाकारों द्वारा सूफी संत एवं वारसी भजनों परंपरागत से होती रही है इसके बाद वारिस पिया के भक्तों के द्वारा महंथ बाबा व नंदबाबा की समाधि को गंगा जल से पवित्र करने पर पहले यज्ञोपवीत यानी जनेऊ चढ़ाया गया।पूजन के अंतराल में यहां के प्रशासनिक स्तर पर भी पूजा में तहेदिल से चादरपोशी की रश्म अदायगी की गई। इस दौरान मांगें गए मन्नतें पूरी होने पर दूर दराज एवं विभिन्न प्रदेशों से आए श्रद्धालुओं द्वारा चादरपोशी एवं प्रसाद चढ़ाने का अंतहीन सिलसिला चलता रहा।हरेक श्रद्धालु को श्रद्धेय परम पूज्य महंथ बाबा और उनके धार्मिक गुरु नंदबाबा समाधि पर माथा टेकने का सुअवसर मिला। इस मड़ही पूजा में पूजन एवं मुंडन के संस्कार का विशेष महत्व के रूप में लोगों की मान्यता व आस्था से जुड़ गया अमिट व अटूट विश्वास का एक जीता जागता उदाहरण प्रेरणाश्रोत के रूप में अविश्वमणीय एवं अक्षुण्ण है। सर्वविदित है कि यह कारवां युग युगांतर से इस अंधेरगर्दी के पतनशील निकृष्ट अंधभक्ति के दौर से गुजरता आ रहा है।
सुस्पष्ट ज्ञात हो पहले कि वारसिया मत क्या है ? इसकी उत्पति कैसे और कब हुई ? इसकी कम से कम प्राथमिक जानकारी जरूर होनी चाहिए वारिस पिया के भक्तों को। इस संदर्भ में प्राप्त कुछ जानकारी के मुताबिक वारिस पिया का मतावलंबी भी सूफी सम्प्रदाय के विचारसे जुड़े थे। जानकारी हो कि सूफी सम्प्रदाय का इस देश में पदार्पण वैसे संकट की विकट परिस्थितियों हुआ जिस समय मुगल सल्तनत की क्रूर तानाशाही अखंड हुकूमत व राजशाही सरकार चल रही थी। इतना ही नहीं बल्कि गैर मुस्लिमों को जोर जबर्दस्ती से मुस्लिम करण करने का चरम जालिम जुल्मी दौर तेजी से चल रहा था।इसी कालखंड में मुगल सल्तनत के घोर जबरन मुस्लिमकरण के विरुद्ध एक सूफी सम्प्रदाय नामक धार्मिक सोशल संस्था का प्रादुर्भाव यहां हुआ। यह सम्प्रदाय जाति धर्म,सम्प्रदाय ,मजहब , उच्च नीच ,भेदभाव के अलग हट कर सूफी सम्प्रदाय नामक संस्था के नाम से सुविख्यात हुआ ।कालांतर में यही सूफी सम्प्रदाय तीन खेमों में अलग हो गए। ये तीनों निम्न हैं : 1. वारसिया, 2.चित्श्तियां और 3. कादरिया के रूप में विश्व सुविख्यात हैं।वारिस पिया के सर्वोच्च स्थान देवा शरीफ है । चिश्तिया मतावलंबियों का हेड क्वाटर अजमेर शरीफ है और कादरिया मतावलंबियों के अलग अलग अपने स्थान हैं।