औरंगाबाद ख़बर सुप्रभात समाचार सेवा
औरंगाबाद ब्यवहार न्यायालय के वरीय अधिवक्ता दयानंद प्रसाद ने औरंगाबाद ब्यवहार न्यायालय के प्रधान जिला जज के नाम खुली चिट्ठी जारी करते हुए कई गंभीर आरोप लगाये हैं। खुली चिट्ठी का प्रतिलिपि पटना हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को भी भेजा गया है। अधिवक्ता ने खुली चिट्ठी में लिखते हुए कहे हैं कि चालीस वर्ष के वकालत पेशे में कभी

भी न्यायालय को जमींदार का दरबार बनते नहीं देखा जहां वकिल समुदाय तथा मोवकिल के साथ कुछ चुनिंदे पेशकार के माध्यम से दुरब्यवहार कराया जाता है।विरोध करने पर कोई न कोई बहाना बनाकर गलत आरोप लगाया जाता है।साथ ही मुकदमा दर्ज कर दिया जाता है। फलस्वरूप विधी संघ में भारी आक्रोश व्याप्त है। खुली चिट्ठी में उल्लेख है कि अधिवक्ताओं को न्यायालय में रेकर्ड भी देखने की अनुमति

नहीं है कह कर रेकर्ड भी देखने नहीं दिया जाता है। खुली चिट्ठी में आगे उल्लेख है कि कुर्सी से मात्र पांच -सात फीट की दुरी पर बैठा व्यक्ति खुलेआम पैसा वसूल रहा है।जो गरीब पैसा देने में असमर्थ है उसे चार महीने का लम्बा तारीख़ फेंका जा रहा है। उन्होंने आगे लिखे हैं कि पंकज सिंह ( पेशकार ) जो सब जज -6 के न्यायालय में इजलास पर पेशकार हैं उनके द्वारा मुकदमा जिताने के लिए ठीका भी लिया जाता है। उन्होंने खुली चिट्ठी में यह भी उल्लेख करते हुए गंभीर आरोप लगाये हैं कि TS No 287/10 ( रामजन्म राजवंशी बनाम शुर्जदेव महतो) जिसमें फैसला का फर्ज़ी तिथि बताया जा रहा है और बैक डेट में फैसला लिख दिया गया। इस लिए कि पैसा देने से इंकार किया जा रहा था।एक अन्य बटवारा वाद संख्या 130/12 का भी उल्लेख करते हुए खुली चिट्ठी में कहा गया है कि पेशकार पंकज सिंह द्वारा मुकदमा जिताने के लिए पैसा का मांग किया जा रहा है। अधिवक्ता ने खुली चिट्ठी में यह भी आशंका ब्यक्त करते हुए लिखे हैं कि न्याय का गला घोंटने में कितने लोग साझेदार है? अधिवक्ता द्वारा जारी किए गए खुली चिट्ठी से फिलहाल न्यायिक ब्यवस्था पर एक बड़ा प्रश्न चिन्ह खड़ा हो रहा है। यदि खुली चिट्ठी में सत्यता तो उच्चस्तरीय जांच से ही प्रकाश में आयेगा।