नवादा से डीके अकेला की रिपोर्ट
नवादा जिले के कौआकोल प्रखंड के रूपौ थाना क्षेत्र के अंतर्गत पाण्डेय गंगौट में स्थित वारिसपिया के अनुयायियों द्वारा महान सूफी संत श्री श्री 1008 नंदबाबा के वार्षिकोत्सव सह दो दिवसीय मड़ही पूजा शुक्रवार को बड़ी श्रद्धा,भक्ति और उत्साह के साथ आगाज किया गया। पूजा की शुरुआत होते ही पूर्ण भक्तिमय माहौल में पूरा गांव व


इलाके डूब चुका है। इस मड़ही पूजा में दूर -दराज के जिलों समेत देश के विभिन्न क्षेत्रों से बड़ी संख्या में यहां श्रद्धालुओं तथा वारसी धर्मावलंबियों के पहुंचने का सिलसिला क्रमशः लगातार जारी है।मड़ही पूजा आयोजन समिति के सदस्य नारायण स्वामी मोहन ने बताया कि वार्षिकोत्सव के सुअवसर पर नंदबाबा की समाधि पर चादरपोशी,विशेष पूजा- अर्चना,धार्मिक अनुष्ठान,सूफी भजन,कव्वाली के साथ प्रसाद वितरण का आयोजन किया जा रहा है।
ज्ञात हो कि सूफी भजन के बीच विधि-विधान के साथ नंद बाबा की समाधि को शुद्ध गंगा जल से पवित्र स्नान कराया गया। इसके बाद यज्ञोपवीत यानी जनेऊ चढ़ाया गया। समाधि पर कुर्ता, धोती, मिरजई,टोपी,खड़ाऊ के साथ सरकारी चादरपोशी सहित सोलहों प्रकार के श्रृंगार चढ़ाने के बाद 56 प्रकार के भोग लगाकर परम पूज्य नंदबाबा की दिल से आराधना की गई।
सर्वप्रथम सरकारी पूजा व चादरपोशी रश्म अदायगी के उपरांत आमलोगों ने पूजा – अर्चना और चादरपोशी की। इस दरम्यान मन्नतें पूरी होने पर दूर दराज एवं विभिन्न प्रदेशों से आए श्रद्धालुओं द्वारा चादरपोशी सहित प्रसादी वितरण सिलसिला धाराप्रवाह अनवरत रूप से चलता रहा। बाहर से आए श्रद्धालुओं को ठहरने,भोजन,पेयजल,रोशनी तथा अन्य सहूलियत की पूरी सुविधाओं की समुचित व्यवस्था की गई है।काफी संख्या में लोगों द्वारा मन्नतें मांगने के लिए कतारबद्ध होकर नंदबाबा की समाधि पर मथा टेककर आराधना में लगे रहे।हर श्रद्धालु माथा टेक कर ही बाहर निकल रहे थे। 4 बजे अपराह्न से प्रसाद वितरण का कार्यक्रम शुरू किया गया।इस दो दिवसीय पूजा को लेकर खासकर पाण्डेय गंगौट गांव समेत इसके आसपास के कई गांवों में मेहमानों की जमघट से पटा पड़ा है।
विदित हो इस परंपरा की शुरूआत सूफी संतों के द्वारा वैसे परिस्थितियों में किया गया, जिस समय मुगल सल्तनत अपने पूरे शबाव पर था। जबरन जोर जबर्दस्ती से हिंदुओं को मुस्लिम बनाने की प्रक्रिया संचालित हो रहा था।इसी संक्रमण काल में सूफी सम्प्रदाय व सूफी संतों का प्रादुर्भाव हुआ। कालांतर सूफी सम्प्रदाय तीन खेमों में अलग विभाजित हो गया। तीन खेमा में 1. वारसीया, चिश्तिया और किश्तियां में विभक्त हो गया। इस मड़ही पूजा की विशेष खासियत यह रही कि यहां लोग जातपात,धर्म व सम्प्रदाय के साथ उच्च नीच तथा छुआछूत की दुर्भावनाओं से दरकिनार होकर एक साथ एक ही तरह से पूजा की।यहां पूजा के दौरान मजहब की दीवार पूरी तरह चरमरा कर ध्वस्त हो जाती है।
सामाजिक और सांप्रदायिक सौहार्द की एक अनूठी विचित्र मिशाल यह है। मड़ही पूजा की सबसे बड़ी विशेषता इसकी गंगा -यमुनी संस्कृति व बड़े सांप्रदायिक सौदर्द है।समाधि पर चढ़ाए गए चादर को हिंदू एवं मुस्लिम समुदाय के लोग एक साथ एकजुट होकर तहे दिल से अर्पित करते हैं।इस दरम्यान जाति,धर्म और उच्च नीच व संप्रदाय के भेदभाव पूरी तरह से समाप्त हो जाता है। और सभी श्रद्धालु एकजुट साथ बाबा के दरबार में माथा टेक कर सुख,शांति,अमन एवं समृद्धि का कामना व मन्नतें मांगते हैं।
वारसी व सूफी भजन का दौर दिनरात चलता रहा। विभिन्न प्रदेशों से आए कलाकारों द्वारा एक से बढ़कर एक सूफी भजन,गजल,कव्वाली और वारसी भजन दरबार में पेश किए गए। पूजा की शुरुआत पहले वारसी एवं सूफी भजन सुप्रसिद्ध कलाकारों द्वारा वारिस पिया एवं नंदबाबा की स्मृति में पेश किया गया। इस दौरान श्रोता श्रद्धालुओं की जबर्दस्त तालियां बटोरने का कलाकारों को सुअवसर प्राप्त हुआ। सूफी भजन एवं गजल के गायक अजय उर्फ पप्पू पांडेय के साथ तबला पर उपेंद्र शर्मा, ढोलक पर राजेंद्र सिंह ने संगत करते हुए लोगों को काफी मजा व आनंद उठाने का मौका दिया।पूजा समारोह की सफलता में सारंगधर मोहन ,पूर्व जिला परिषद नारायण स्वामी मोहन,दीपक कुमार मुखिया, शुभंकर कुमार,चन्द्रमौली सिंह,अनुज प्रसाद, रामचन्द्र सिंह,शिव शंकर सिंह,मुकेश कुमार वारसी के साथ सभी ग्रामीणों और इलाके वासियों का अहमअद्वितीय योगदान रहा।
मड़ही पूजा हिंदू-मुस्लिम एकता का एक अद्भुत प्रतीक।पाण्डेय गंगौट की मड़ही पूजा समाज में गंगा-यमुनी तहजीब की यह खास संदेश देने का काम करता है। पूजा के दौरान वैसे लोगों की भीड़ की खासी होती है,जो लोग अपनी मन्नतें पूरी होने के बाद नंदबाबा की समाधि पर मथा टेकने पहुंचते हैं। पांडेय गंगौट मड़ही पूजा हिंदू-मुस्लिम एकता यानी गंगा- यमुनी तहजीब की विशेष खासियत यह है कि यहां लोग जातिपात, छुआ छूत,धर्म-संप्रदायवाद,भेदभाव, उच्च व नीच की दुर्भावनाओं से दरकिनार होकर एक साथ पौराणिक परंपरावादी रीति – रिवाज से सभी पूजा करते हैं। यह परम्परा शुरुआत से लेकर आज तक चलती आ रही है। यहां की पूजा की नजारा ही अलग रहता है। इसी विशेष खासियत को लेकर पूजा के दौरान यहां मजहब की दीवार पूरी तरह ढह कर ध्वस्त हो जाती है। क्या हिंदू एवं क्या मुस्लमान,बच्चें और बूढ़े सभी एक ही वारसीया रंग में रंग कर वारिस पिया के धुन में थिरकते नजर आ रहे हैं।