अम्बा (औरंगाबाद) खबर सुप्रभात सामाचार सेवा
सनातन संस्कृति में हर ब्रत – त्योहार का अपना -अपना धार्मिक मान्यता एवं आध्यात्मिक महत्व है। सनातन संस्कृति में नदी, कुँआ, तालाव, पशु, पक्षी एवं वृक्ष पूजन की परंपरा अनादि काल से रही है। ऐसे में बट – सावित्री पूजा सुहागिन महिलाओं के लिए काफी श्रद्धा और विश्वास का प्रतिक है।
यह पर्व पति – पत्नि के अटुट प्रेम और समर्पण का प्रतिक है।

सावित्री के नाम पर ही इस पर्व का नामकरण वट – सावित्री पूजा पड़ा है।इस तिथि को सुहागिन महिलायें स्नान कर सोलहो श्रृंगार करती हैं। थाल में पूजन सामग्री सजा कर हाँथ में बाँस का बेना लिए समुह में बरगद के पेंड़ के निकट पूजन के लिए जमा होती हैं। ऐसी मान्यता है कि बरगद के पेंड़ में त्रिदेव ( ब्रह्मा, विष्णु और महेश ) का बास होता है। बरगद के जड़ में ब्रह्मा, तना में विष्णु तथा शाखाओं में महेश अर्थात शंकर का बास होता है। ब्रह्ला, सृष्टि की रचना करनें वाले हैं । विष्णु पालनहार हैं, तथा महेश संहारक हैं। पूजनोपरांत महिलायें बट वृक्ष को रक्षासूत्र बाँधती है एवं अपनें पति एवं सुहाग – सिन्दुर की रक्षा का वर माँगती है।
पौराणिक महत्व………….. इस ब्रत का पौराणिक महत्त्व है कि सावित्री नें अपनें मृत पति सत्यवान के प्राणों को अपनें सतीत्व एवं पतिव्रता धर्म के आधार यमराज को तर्कों से निरुतर कर वापस लाया एवं जिवीत किया था। ऐसी मान्यता है कि इस ब्रत को करनें से हर बैवाहिक बाधा दुर होता है एवं दाम्पत्य जीवन सुखमय होता है । आज की तिथि का खास महत्व तो और बढ़ जाता है कि आज जेष्ठ अमावश्या एवं शनि जयंती भी है। इस तिथि को बट – सावित्री पूजन काफी फलदायक, सुख – शांति – समृद्धि एवं अखंडसुहाग को देने वाला है।

