पलटू चाचा नीतीश कुमार की बेमिसाल जगजाहिर पलटनियां

डीके अकेला का रिपोर्ट


जिस पलटू चाचा नीतीश कुमार को गोदी व बिकाऊ मिडिया, चमचे व चाटुकार विकास पुरुष के रूप में प्रक्षेपित करते रहे तथा “नीतीश कभी मानता नहीं और भ्रष्टाचार से समझौता नहीं” का नारा बुलंद करते नहीं थकते थे, वही नीतीश कुमार ने बिहार के विकास में एक ऐसा मानक स्थापित किया है कि बिहार पर चार लाख करोड़ रुपए का कर्ज है। हर बिहारी के सिर पर सत्रह हजार रुपए का कर्ज है। बिहार के नियंत्रक

महालेखाकार कार्यालय, भारत सरकार द्वारा प्रस्तुत बिहार सरकार के आय-व्यय के दस्तावेज में सत्तर हजार करोड़ रुपए का कहीं कोई हिसाब-किताब ही नहीं मिल रहा है। यह बिहार का बच्चा-बच्चा जानता है कि नीतीश कुमार ने भ्रष्टाचार को बिहार का संस्कार बना दिया है। पूरे बिहार में ऐसा कोई भी सरकारी कार्यालय या विश्वविद्यालय व संस्थान नहीं है, जहां साहब और कर्मचारी को बिना कुछ चढ़ावा के किसी का कोई काम हो जाए। सड़क और पुल-पुलियों के निर्माण में आज ठेकेदारी, कमीशनखोरी और दलाली का जो त्रिआयामी फंदा बिहार में बना है, उससे बिहार दिवालिया होने के कगार पर है। सरकारी खजाना खाली होने का सरकारी हवाला दिया जा रहा है। सरकारी कर्मचारियों और विश्वविद्यालयों के शिक्षकों एवं कर्मचारियों को मार्च से अबतक का वेतन भी नहीं मिला है। कितने कर्मचारी के घर परिवार मुखों मरने के कगार पर खड़े हैं। इधर, दूसरी ओर चुनाव में जिस तरह वोट को खरीदने के लिए सरकारी रुपयों का बंदरबांट बेशर्मी से सरकारी नियम और प्रावधान के घोर विपरीत हुआ था, उसने बिहार सरकार की मौजूदा वित्तीय स्थिति को पूर्ण रूपेण डांवाडोल कर दिया है। चुनाव के क्रम में भी जिस तरह से जीविका दीदी और महिलाओं को दस-दस हजार रुपए की राशि चुनाव आचार संहिता का खुल्लमखुल्ला उलंघन कर वोट खरीदे गए थे। उसने बिहार में एनडीए की सरकार तो बनवा दी,पर बिहार को कूपमण्डूक में ढकेल कर आर्थिक रूप से पूर्ण दिवालिया भी बना दिया है। शिक्षा माफिया,बालू माफिया और शराब माफियाओं ने सरकार के साथ गठजोड़ कर पूरे बिहार में भ्रष्टाचार को संस्कृति के रूप में आज प्रक्षेपित और प्रतिष्ठापित कर दिया है। शिक्षा और विकास के क्षेत्र में बिहार आज भी देश के सबसे गये गुजरे राज्यों में शामिल यानी निचले पायदान पर मुंहवाएं खड़ी है। बेरोजगारी अपने चरम पर है। रोजगार के घोर अभाव में बिहार के नवजवानों के लिए काम की खोज में दूसरे राज्यों में पलायन करना ही एकमात्र विकल्प और मज़बूरी बन कर रह गया है। बिहार में राजनीतिक सता एन केन प्रकारेण हासिल करने के लिए एड़ी चोटी एक कर पानी की तरह पैसे बहाए जा रहे हैं। पर,पूरे बिहार में एक भी उद्योग का दर्शन नहीं हुआ है और न तो उन्हें होगा। ठेकेदारी, कमीशनखोरी और घूसखोरी छोड़कर बिहार में कोई भी उद्योग स्थापित नहीं किया गया है। कॉर्पोरेट घरानों के इशारे पर वाली मोदी सरकार की तरह ही नीतीश कुमार भी बीस सालों से लगातार पलटनियां मार-मार कर सिर्फ अपना चेहरा चमकाते रहे। साम्राज्यवादी विकास की नकली ढिंढोरा पीटते व फर्जी घोषणाएं करते रहे, सरकारी रूपये का दुरुपयोग कर चुनावी यात्राएं करते रहे। अति आत्मकेंद्रित, आत्ममुग्ध और आत्मतुष्ट बनकर स्वयं को आधुनिक अशोक महान समझते रहे , भावी इतिहास के पन्नों में विकास पुरुष की आड़ में एक घोर अवसरवादी और स्वार्थी चाटुकार नेता के रूप में हमेशा याद किया जायेगा। अंततोगत्वा परिवारवाद का विरोध करने वाले तथाकथित विकास पुरुष नीतीश कुमार अपने पुत्रमोह के जाल में खुद कैसे फंस चुके हैं ? नीतीश कुमार के क़ानून के राज और सुशासन अब सिर्फ़ कथनी बन कर रह गई है।नीतीश कुमार आज भाजपा की मात्र बनाबटी व दिखाबटी कठपुतली बनकर उसके इशारे पर गड़थईयो नंगे थिरक रहे हैं। तत्कालिक लाभ के फेरे में दूरगामी भावी लाभ से पूर्णतः बंचित हो गए हैं। नीतीश कुमार ने अपने बहुमूल्य जीवन में काले अध्याय का बीजारोपण जब उसने ख़ुद ही किया तो इसका कड़वा फल सिर्फ़ नीतीश को छोड़कर कौन खायेगा ?