महुआ धाम में अंधविश्वास पर लगाम कब? एसडीओ के दौरे के बाद भी व्यवस्था में सुधार नहीं, आस्था की आड़ में अवैज्ञानिक गतिविधियों को बढ़ावा देने का आरोप, श्रद्धालुओं की सुविधाओं और चढ़ावे के हिसाब पर भी उठे सवाल

कुटुम्बा (औरंगाबाद ) संवाद सूत्र ख़बर सुप्रभात समाचार सेवा

कुटुंबा (औरंगाबाद)। वैज्ञानिक सोच और आधुनिक चिकित्सा के दौर में भी कुटुंबा प्रखंड का महुआ धाम अंधविश्वास और कुव्यवस्था को लेकर चर्चा में है। नवरात्र के दौरान यहां उमड़ने वाली भीड़ के बीच कथित तौर पर प्रेतबाधा से मुक्ति के नाम पर महिलाओं के असामान्य व्यवहार को धार्मिक शक्ति से जोड़कर प्रचारित किया जाता है। इस परंपरा को लेकर सवाल उठ रहे हैं कि आखिर आस्था और अंधविश्वास के बीच की रेखा कब स्पष्ट होगी और प्रशासन इस दिशा में ठोस पहल कब करेगा? स्थानीय स्तर पर पहले भी धाम की व्यवस्था को लेकर सवाल उठते रहे हैं। एसडीओ के निरीक्षण के बाद भी स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं होने की बात कही जा रही है। हालांकि, प्रशासनिक कार्रवाई और वर्तमान व्यवस्था की स्थिति पर संबंधित अधिकारियों का आधिकारिक पक्ष सामने आना बाकी है।

आस्था के नाम पर अवैज्ञानिक गतिविधियों का आरोप

नवरात्र के दौरान धाम परिसर में बड़ी संख्या में महिलाएं बाल खोलकर झूमती, चीखती और असामान्य हरकतें करती दिखाई देती हैं। कुछ लोग इसे माता की शक्ति या प्रेतबाधा से जोड़ते हैं। लेकिन मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं और शारीरिक बीमारियों को केवल भूत-प्रेत का मामला मानना मरीजों के लिए नुकसानदेह हो सकता है। ऐसी स्थिति में चिकित्सकीय जांच और उचित उपचार जरूरी है।
इस बीच कुछ मीडिया चैनलों पर भी सवाल उठ रहे हैं कि क्या वे ऐसी गतिविधियों को बिना वैज्ञानिक पड़ताल के धार्मिक चमत्कार के रूप में प्रस्तुत कर अंधविश्वास को बढ़ावा दे रहे हैं? मीडिया की जिम्मेदारी है कि वह सनसनी के बजाय तथ्य, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और जनहित को प्राथमिकता दे।

चढ़ावे की पारदर्शिता और प्रबंधन पर सवाल

महुआ धाम में श्रद्धालुओं की बढ़ती भीड़ के बीच मंदिर प्रबंधन और मेला संचालन की व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। श्रद्धालुओं से मिलने वाले चढ़ावे तथा मेले से होने वाली आय का हिसाब सार्वजनिक होता है या नहीं, यह स्पष्ट होना चाहिए। स्थानीय स्तर पर पारदर्शिता की मांग के बीच संबंधित समिति को आय-व्यय का ब्योरा सामने रखना चाहिए, ताकि किसी तरह के संदेह की गुंजाइश न रहे। हालांकि, आर्थिक अनियमितता के आरोपों की पुष्टि के लिए दस्तावेजी साक्ष्य और संबंधित पक्षों का जवाब जरूरी है। फिर भी श्रद्धालु और स्थानीय लोग अनियमितता की आवाज उठाते दिखाई देते हैं।

हजारों श्रद्धालु, लेकिन बुनियादी सुविधाओं की कमी

बिहार के अलावा झारखंड, उत्तर प्रदेश और छत्तीसगढ़ से भी श्रद्धालुओं के पहुंचने की बात कही जाती है। इसके बावजूद धाम परिसर में स्वच्छ पेयजल, शौचालय, साफ-सफाई, प्राथमिक स्वास्थ्य शिविर और भीड़ नियंत्रण जैसी सुविधाओं को लेकर शिकायतें सामने आती रही हैं। यदि ये व्यवस्थाएं पर्याप्त नहीं हैं, तो संबंधित विभागों और मेला प्रबंधन को तत्काल सुधार करना चाहिए।

प्रशासन से जवाबदेही की मांग

महुआ धाम की स्थिति कई अहम सवाल खड़े करती है। एसडीओ के निरीक्षण के बाद व्यवस्था में क्या सुधार हुआ? श्रद्धालुओं की सुरक्षा और स्वास्थ्य के लिए क्या इंतजाम हैं? चढ़ावे और मेला राजस्व का हिसाब किस तरह रखा जाता है? अंधविश्वास के नाम पर बीमार लोगों को चिकित्सा से दूर रखने की आशंका पर रोक लगाने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं? आस्था व्यक्तिगत विश्वास का विषय है, लेकिन उसके नाम पर लोगों के स्वास्थ्य, सुरक्षा और आर्थिक हितों की अनदेखी नहीं होनी चाहिए। प्रशासन को धाम की व्यवस्था की समीक्षा कर आवश्यक सुविधाएं सुनिश्चित करनी चाहिए। साथ ही, वैज्ञानिक जागरूकता अभियान चलाकर लोगों को यह समझाना जरूरी है कि बीमारी की स्थिति में झाड़-फूंक के बजाय योग्य चिकित्सक से परामर्श लेना चाहिए। महुआ धाम में आस्था के साथ पारदर्शिता, सुरक्षा और वैज्ञानिक सोच का संतुलन स्थापित करना ही समय की मांग है।