आलोक कुमार, संपादक सह निदेशक ख़बर सुप्रभात
आज देश में आरक्षण समर्थकों तथा आरक्षण विरोधियों का स्वर फिर से गूंज रहा है। दोनों पक्षों के यूट्यूब और TV डिबेट में अपने अपने पक्षों को मजबूती से रखा जा रहा है। संविधान बचाने के लिए लोकसभा में प्रतिपक्ष के नेता राहुल गांधी संविधान के प्रति लेकर कस्म खा रहे हैं यहां तक कि देश भर में आयोजित जनसभा में भी संविधान को बचाने के

लिए अपनी प्रतिबद्धता दुहरा रहे हैं।इधर सत्तारुढ़ भाजपा और इनके सहयोगी पार्टियों ने भी संविधान, कानून और आरक्षण को कोई मां के लाल मिटा नहीं सकता कह रहे हैं। कांग्रेस ने भी आरक्षण को बरकरार रखने का वकालत कर रही है। लेकिन सवाल अब देश के सामने है कि क्या किसी भी जाति,धर्म क्षेत्र या भाषा के आधार पर आरक्षण संविधान के मूल में लिखा है। जब इमानदारी और पारदर्शिता पूर्ण अध्ययन करेंगे तो जाहिर होगा कि नहीं। तो फिर जाती -धर्म के नाम पर आरक्षण कैसे हुआ और इसके लिए जिम्मेवार कौन लोग हैं? ज़बाब है कि इसके लिए जिम्मेवार आजादी के बाद से केन्द्र में बनने वाली कांग्रेस – भाजपा के सरकार मूल रूप से दोषी है। चुके संविधान में संशोधन केन्द्र सरकार करती है राज्य सरकार नहीं।इस लिए लालू प्रसाद यादव, मायावती, ममता बनर्जी और अन्य राज्य सरकार के मुखिया को कतई जिम्मेवार नहीं कहा जा सकता है।अब आइए आरक्षण के सवाल पर चर्चा करते हैं। संविधान के मूल अनुच्छेद 332 के तहत राज्य के विधानसभाओं में आरक्षण का प्रावधान किया गया है तथा अनुच्छेद 330 के तहत लोकसभा में आरक्षण का प्रावधान है। लेकिन अनुच्छेद 334 के तहत यह भी प्रावधान बनाया गया था कि उक्त आरक्षण महज़ 10 वर्षों तक ही रहेगा और 10 वर्षों के बाद आरक्षण स्वत: समाप्त हो जायेगा। मतलब संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू किया गया था उसके हिसाब से 26 जनवरी 1960 में आरक्षण समाप्त हो जाना चाहिए था। लेकिन सत्ता में बैठे कांग्रेस – भाजपा की सरकारें वोट बैंक के लिए संविधान और लोकतंत्र का हत्या किया और अभी तक कांग्रेस – भाजपा की सरकारें संविधान में सात बार संशोधन करते हुए आरक्षण का दायरा प्रत्येक 10वर्षो के लिए बढ़ाते गया। ज्वाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी, मोरारजी देसाई जिस सरकार में अटल बिहारी वाजपेई भी मंत्री थे, बीपी सिंह,राजीव गांधी, मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी भी संविधान संशोधन किया और आरक्षण के दायरा बढ़ाते गये।इन लोगों ने न सिर्फ संविधान के हत्या किया बल्कि लोकतंत्र को भी हत्या करने का कार्य किया है। लोकतंत्र में चुनाव लडने और वोट देने का अधिकार सभी को है और इसके लिए जाती -धर्म के नाम पर प्रतिबंधित करने का मतलब गुलाम बनाकर रखना। और जब किसी ख़ास क्षेत्रों में जब चुनाव नहीं लडेंगे तो फिर लोकतंत्र कैसा? यह भी एक अहम् सवाल लोकतांत्रिक मूल्यों के समक्ष खड़ा है। आश्चर्य तो यह है कि लोकसभा और विधानसभा में तो आरक्षण को 10 वर्षों में हटाने के बजाय संविधान संशोधन के जरिए बढ़ाया ही गया इसके साथ ही नगर निकाय और पंचायतों में भी आरक्षण लागू कर दिया गया और जन्म – जाती के आधार पर चुनाव लडने के अधिकार पर रोक लगा दिया गया। एक महत्वपूर्ण विषय यह है कि संविधान में जम्मू-कश्मीर के लिए अनुच्छेद 370 अस्थाई यानी कुछ समय के लिए लागू किया गया था। लेकिन नरेंद्र मोदी की सरकार ने सबका विकास सबका न्याय की बात कहते हुए संसद के जिस सत्र में धारा 370 हटाने का विधेयक लाया था उसी सत्र में आरक्षण को और बढ़ाने का विधेयक लाया था।सबका विकास और सबका न्याय तब होता जब दोनों आरक्षण को समाप्त कर दिया जाता। लेकिन ऐसा न कर नरेन्द्र मोदी सरकार भी धर्म और जाति के नाम पर देश में झगड़ा बढ़ाने और फुट डालो शासन करो का रास्ता अपनाया।अब चलते हैं अनुच्छेद 16खंड (4) क्या कहता है इसके अंतर्गत नौकरी में जाती नहीं बल्कि राज्य के पिछड़े हुए नागरिकों को 10 वर्षों तक नौकरी देने का प्रावधान है लेकिन उम्र में कोई छुट नहीं दिया गया है।लेकिन वोट बैंक के स्वार्थ में केन्द्र में बनने वाली तमाम सरकारों ने जातियों के नाम पर नौकरी देने तथा संविधान को संशोधित कर संविधान के मूल आत्मा और लोकतंत्र की हत्या किया है और अंग्रेजों के तरह फुट डालो शासन करो का रास्ता अख्तियार कर लिया है।

