डीके अकेला के कलम से
डबल ईंजन की कोरी बकवास एवं दिवा स्वप्न देखाने वाली तथा बाह्यडंबर का ढिंढोरा पीटने वाली और झूठा अफवाह और अराजकता फैलाने वाली तथाकथित सुशासन और कानून की राज का ढिंढोरा पीटने वाली नकारा सरकार ताश के पत्ते की तरह बूरी तरह बिखर कर घुटने टेक कर बिखर

गए हैं। देश के औद्योगिकीकरण एवं आर्थिक विकास के नाम पर केंद्र की भाजपा नीति मोदी सरकार ने * मेक इन इंडिया * ( भारत में एमएमबनाओ ) का नारा दिया। विकसित पूंजीवादी -साम्राज्यवादी देशों को भारत में पूंजी लगाने तथा उद्योग धंधे स्थापित करने का नारा दिया। इसके तहत ज़बरदस्ती कम दा म पर जमीन लेकर इनको दिया गया तथा उसमें कार्यरत कामगारों को उनके मजदूर को अपने न्यायोचित अधिकारों से बंचित किया गया। इसको लेकर मजदूरों का समझौताहीन जबर्दस्त आंदोलन शुरू हो गया।
मजदूर एवं अन्य कामगार अपना मजदूर संघ यानी यूनियन बनाना चाहते थे , जिस कार्यरत मजदुर को कारखाना के मालिक और सरकार मान्यता व सम्मान दें। लेकिन उद्योग का प्रबंधन व है इनके यूनियन को मान्यता देने को तैयार नहीं था। मजदूरों से अत्यधिक समय तक काम लिया जाता रहा था। निर्धारित 8 घंटे से ज्यादा काम और अन्य तरह से दमन का शिकार का नाहक मोहरा बनाया जाता था।
इसके खिलाफ यूनियन ने चंद वर्ष पहले मारुति सुजुकी के गुड़गांव के पास के मॉनेसटर प्लांट में बहुत बड़ा आंदोलन हुआ। बड़े पैमाने पर जबर्दस्त हिंसा भी हुई। सैकड़ों मजदूर गिरफ्तार किए गए तथा अनेकों को नौकरी से निकाल दिया गया। तत्पश्चात उनके यूनियन को मान्यता प्रदान करने में सफलता मिली। लेकिन अस्थाई कर्मचारी कामगार को उससे बाहर रखा गया। लेकिन वहां कई बड़े पैमाने पर हिंसा भी हुई। सैकड़ों मजदूर गिरफ्तार किए गए। अनेकों को नौकरी से निकाल दिया गया । तत्पश्चात उनके यूनियन को मान्यता के लिए पुनः संघर्षरत रहना पड़ा।29-30 ،जनवरी को उन्होंने मानसेर प्लांट पर अपनी मांगों के समर्थन में विशाल प्रदर्शन किया ,जिसमें हजारों मजदूरों की सशक्त भागीदारी सुनिश्चित रहा। यूनियन मान्यता के साथ उनकी प्रमुख मांगे हैं, उनकी पगार कम से कम 40%बढ़ाई जाय। डबल ईंजन की दलाली व कमर तोड़ दमनकारी तानाशाही क्रूर सरकार ने आंदोलनकारियों को बहुत दूर ले जाकर जंगल में छोड़ दिया। पुनः उन्होंने जिला पदाधिकारी ने अपनी कमजोरी के सामने 31 जनवारी 26 को बहुत बड़ा प्रदर्शन किया गया। लेकिन,प्रशासन ने उसका दिलेरी से साथ या समर्थन नहीं दे रहा है। मारुति उद्योग का प्रबंधन के मांगो को मानने को तैयार नहीं है। उचित मांग मानने में कौन सी परेशानी या घबराहट है ? दूसरी महत्वपूर्ण घटना तमिलनाडु के कांचीपुरम की है, जहां मोबाइल, टीवी इत्यादि अनेकों समानों की उत्पादन करने वाली सैमसंग कम्पनी की फैक्टरी है। वहां भी लंबे समय से मजदूर अपने यूनियन की मान्यता के लिए संघर्ष कर रहे थे। लेकिन, सरकार उनके यूनियन को मान्यता देने यानी रजिस्टर करने में अनावश्यक विलम्ब कर रही थी। अंततः यह मामला मद्रास हाईकोर्ट में पहुंच गया, जहां हाईकोर्ट ने सरकार को 6 हफ्तों के दौरान इस पर कानून संगत फैसला लेने का आदेश दिया। इसके बावजूद सैमसंग कम्पनी के प्रभाव के वजह से सरकार टालमटोल कर रही थी। लेकिन अंततः आंदोलन बहुत तीव्र होता चला गया । उसको मिले अपार जनता का व्यापक जन समर्थन को देखते हुए तमिलनाडु के दलाल मुख्यमंत्री स्टालिन के हस्तक्षेप के बाद काफी संघर्ष के बाद कार्यरत मजदूर यूनियन का पंजीकरण यानी रजिस्ट्रेशन 27 जनवरी 2025 को हुआ।
मारुति की कारें और सैमसंग के मोबाइल लाखों की संख्या में यहां उत्पादन होते हैं। यह भारत समेत अन्य देशों के बाजार में बिकता है। इनको इससे अकूत मुनाफा होता है। लेकिन ये अपने कार्यरत मजदूरों को समुचित पगार व अन्य लाभ देने को कतई तैयार नहीं हैं। उनसे निर्धारित 8 घंटों से अधिक समय तक जबरन काम लिया जाता है तथा अन्य सहूलियत सरकार प्रदत देने के लिए तैयार नहीं हैं। लेकिन सबसे सुखद बात है कि हमारी सरकारे (राज्य एवं केंद्र की) मजदूरों की रक्षा करने के बजाय इन कॉर्पोरेट घरानों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के पक्ष में दृढ़ता से लाभ दिलाने के पक्ष में निर्लज्जतापूर्वक खड़ी है। इस विकास का फायदा बड़ा असली आज किसको मिलता है ? ये बहुराष्ट्रीय कंपनियों जो विदेशी हैं और वे अपने देश की सरकार के अधीन काम करती हैं। यहां के भ्रष्ट दलबदलु को सरकारी नेताओं नेताओं व अफसरों की जेब भरते हैं ताकि वे मजदूरों के खिलाफ पुलिस – प्रशासन को संचालित नहीं करें। ऐसे विकास से देश का क्या कल्याण होगा, जहां मजदूरों को उनके मूल अधिकारों से बंचित कर काम लिया जाय और उनका दमन व शोषण किया जाए। यहां के सस्ते श्रम एवं खनिज पदार्थों के द्वारा बनी सस्ती कारें,वाहन, मोबाइल और लैपटॉप विदेशों में बहुत अच्छे मुनाफे पर बिकती है, जिससे ये बहुराष्ट्रीय कंपनियां मालामाल हो जाती हैं। इसीलिए सरकार को आर्थिक विकास के लिए अपने देश को कंपनियों तथा लोक उपक्रम को ही ज्यादा बढ़ावा देना चाहिए,न कि विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को। यह तय की अहम जरूरत है कि हमें अब देश प्यारा है या विदेश।

