सुनील कुमार सिंह खबर सुप्रभात समाचार सेवा
1947 की आजादी के बाद पहली बार बिहार सरकार जमीन का सर्वे करा रही है। यह सर्वे किसानों के लिए गले का फाँस साबित होता दिख रहा है। अंग्रेजी सरकार 1905 में कैडेस्टल सर्वे तथा 1927 में रिभि जिनल सर्वे करायी थी । उसके बाद बिहार सरकार 19 24 से ही सर्वे के काम में लगी है। कभी शिविर में पेपर तो कभी कैम्प में पेपर जमा करवा चुकी है। पुरानी रशीद में सिर्फ खाता एवं रकवा चढ़ाया जाता था । औन लाईन में किसी रैयत का नाम की जगह शून्य तो किसी के खाता की जगह शून्य, तो किसी का प्लौट की जगह शून्य तो किसी का रकवा ही शून्य कर दिया गया है। इसके लिए परिमार्जन प्लस करानें को बोला जाता है। कैफे से औन लाईन कराने के बाद भी रोज अंचल कार्यालय के चक्कर काटते रहनें से भी परिमार्जन प्लस नहीं हो पा रहा है। कभी कर्मचारी का हड़ताल तो कभी सी. ओ. का हड़ताल तो कभी चढ़ावा के चक्कर में जनता परेशान है। बाप – दादा के समय का जमीन का कागज या तो फट – हेरा गया है, या कोई पट्टि दार दबा लिया है और नहीं दे रहा है। ऐसे में सर्वे में कागज कहाँ से लायें, परेशानी का सबब बन चुका है। अंचल कार्यालय एवं जिला अभिलेखागार से कोई कागज का नकल नहीं मिल पा रहा है । ऐसे में रैयतों के सामनें कब्जा के अलावे कोई प्रमाण नहीं है।
सर्वे में वकास्त, वकब्जे मोर्किदार, गैर मजरूआ मालिक, गैर मजरूआ खास भूमि का वंशावली एवं हुकुमनामा को सर्वे अमीन नहीं मान रहे हैं। जो एक गृह युद्ध का आमंत्रण की शुरुआत है। जमिंदारी के समय जो भूमि जमिंदार के निजी कब्जे में रखी गयी थी वैसी भूमि को खतियान में बकास्त भूमि, बकब्जे मोर्किदार, गैर मजरूआ मालिक तथा गैर मजरूआ खास कहा जाता था । जमिंदारी उन्मुलन के बाद 1952 से 55 के बीच जब अंचल का पूर्नगठन हुआ तब जमिंदारों के द्वारा रेंट वसूली का काम बंद कर दिया गया । रेंट वसूली का काम राजस्व कर्मचारी तथा तहसीलदार ( अंचलाधिकारी ) करनें लगे। जमिंदारों नें अपनी जिम्मे की भूमि तथा रैयतों को सेटेलमेंट की गयी भूमि का रिटर्न भरकर अंचल कार्यालय में जमा कर दी । अंचल द्वारा वकास्त, गैर मजरूआ मालिक, गैर मजरूआ खास, वकब्जे मोर्किदार की भूमि का लगान रशीद काट दिया गया । जमिंदार द्वारा नजराना लेकर अपनें रैयतों को परवाना / पर्चा के द्वारा भूमि विक्री किए गये, जिसका अंचल कार्यालय से लगान रशीद कटनें लगी । वर्तमान बिहार सरकार विगत कुछ वर्षों से सर्वे के नामपर ऐसी भूमि का लगान काटना बंद कर चुकी है।
अब सवाल उठना लाजिमी है कि भूमि सर्वे सरकार जनता की समस्या सुलझानें के लिए कर रही है या फिर उलझानें के लिए । यह सर्वे रैयतों के लिए गले का फाँस (फाँसी का फंदा ) बन चुका है।

