कुटुम्बा (औरंगाबाद)अम्बुज कुमार खबर सुप्रभात समाचार सेवा
कुटुंबा प्रखंड क्षेत्र के महुआ धाम मंदिर में इन दिनों अंधविश्वास, आस्था और प्रशासनिक उदासीनता का एक विचलित करने वाला नजारा देखने को मिल रहा है। भूत-प्रेत और बाधाओं से मुक्ति पाने की आस में दूर-दूर से पहुंच रहे लोग नारकीय जीवन जीने को मजबूर हैं, वहीं मंदिर कमेटी और स्थानीय प्रशासन की लचर व्यवस्था के कारण यह धार्मिक स्थल अव्यवस्था का अखाड़ा बन गया है।


गंदे नाली में डुबकी लगाते श्रद्धालु
अंधविश्वास का सैलाब और गंदे नाले में स्नान
महुआ धाम मंदिर में अंधविश्वास की जड़ें इतनी गहरी हो चुकी हैं कि लोग अपनी समस्याओं के समाधान के लिए विवेक खो बैठे हैं। स्थिति यह है कि अंधविश्वास में डूबे श्रद्धालु मंदिर परिसर के पास नाली के गंदे पानी में डुबकी लगाने को विवश हैं। इसके अलावा, समीप की नहर में खुले में महिलाओं को स्नान करना पड़ रहा है, जहां सुरक्षा और बचाव के कोई इंतजाम न होने के कारण हमेशा अनहोनी की आशंका बनी रहती है। स ुविधाओं के नाम पर शून्य, नारकीय जीवन जीने को मजबूरज ानकारी के अनुसार यहां प्रतिदिन लगभग दस हजार लोग दर्शन और पूजा के लिए पहुंचते हैं। इतनी भारी संख्या में श्रद्धालुओं के आगमन के बावजूद मूलभूत सुविधाओं का घोर अभाव है। दूर-दराज से आने वाले लोग नहर किनारे झोपड़ियां बनाकर सालों-साल रहने को मजबूर हैं। लेकिन आज तक न तो यहां श्रधालुओं को ठहरने के लिए धर्मशाला का निर्माण कराया गया है और नहीं अन्य बुनियादी सुविधाएं, श्रधालुओं को खुले में शौच करने के लिए मजबूरी है लेकिन शौचालय और स्वक्ष पेयजल का भी ब्यवस्था नहीं होना यह भी एक अहम् सवाल खड़ा हो रहा है। आखिर मेला से जो राजस्व का वसुली हो रहा है उसका सदुपयोग कहां और कौन कर रहा है? पानी में डूबने की आशंका के बावजूद प्रशासन या मंदिर कमेटी की ओर से सुरक्षा और बचाव कार्य पूरी तरह शून्य हैं। खुले में स्नान करने वाली महिलाओं के लिए चेंजिंग रूम या पर्ची की कोई व्यवस्था नहीं है, जिससे उनकी निजता खतरे में है।और कभी भी कोई अनहोनी होने का प्रबल संभावना बनी रहती है। स्थानीय जनता और पीड़ितों का आरोप है कि मंदिर में आने वाले लाखों रुपये के चढ़ावे का उपयोग श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए करने के बजाय कमेटी के अधिकारी और सदस्य केवल अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए कर रहे हैं। कमेटी न तो ठहरने की व्यवस्था करती है, न खाने-पीने का प्रबंध और न ही सुरक्षा की कोई गारंटी देती है। जनता का सीधा सवाल है कि जब राजस्व आ रहा है, तो सुविधाएं क्यों नदारद हैं?महुआ धाम की इस दयनीय स्थिति को देखकर स्थानीय बुद्धिजीवियों और ग्रामीणों में भारी रोष है। महुआ धाम का यह मेला आस्था के नाम पर चल रहे शोषण और प्रशासनिक लापरवाही की पोल खोल रहा है। यदि समय रहते प्रशासन ने इस ओर ध्यान नहीं दिया, तो कभी भी कोई बड़ा हादसा यहां घटित हो सकता है। सब-कुछ जानते हुए जहां स्थानीय प्रशासन लाचार साबित हो रहा वहीं जनप्रतिनिधियों का खामोश रहना भी एक गंभीर मामला है।