औरंगाबाद: सुनील कुमार सिंह की रिपोर्ट
हिन्दू धर्म में महाल्या का सांस्कृतिक तथा धार्मिक रूप से विशेष महत्व है। यह पर्व पितृ पक्ष की समाप्ति और शक्ति की अधिष्ठात्री देवी माँ दुर्गा के आगमन ( देवी पक्ष ) की शुरूआत का प्रतीक माना जाता है ।
महाल्या के दिन सर्वपितृ अमावश्या भी होता है। इस दिन लोग अपने पितरों की आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करते हैं ताकि पितृगण तृप्त होकर अपनें लोक में गमन कर जायें ।

माँ दुर्गा का आगमन इसी दिन कैलाश पर्वत से पृथ्वी लोक में होता है । देवी माता अपनी यात्रा की शुरुआत करती हैं तथा पुरे भूमण्डल पर भ्रमण करती हैं ।
रविवार को शरदीय नवरात्रा की प्रथम तिथि को देवी माँ शैल पुत्री के रूप में अपनें भक्तों को दर्शन देकर उनका कल्याण करती है । इसी प्रथमा तिथि से ही दुर्गा पूजा की शुरूआत हो जाती है। नौ दिन तक चलनें वाले इस त्यौहार में शक्ति की अधिष्ठात्री देवी दुर्गा के विभिन्न अलग – अलग रूपों को पूजा जाता है । यथा – प्रथम शैलपुत्री, द्वितीय – बह्मचारिणी, तृतीय – चंद्रघंटा, चतुर्थ – कुष्माण्डा, पंचम – स्कंदमाता, षष्ठम् – कात्यानी, सप्तम् – कालरात्रि, अष्ठम् – महागौरी, नवम् – सिद्धिदात्री के रूपों में पूजित होती हैं।
पुरे जिला में दुर्गा पूजा की धूम मच चुकी है। हर जगह भव्य एवं आकर्षक पंड़ाल का निर्माण कर चल रहा है। शिल्पकार देवी की मूर्ति को फाईनल टच देनें में लगे हैं। मदनपुर, औरंगाबाद, अम्बा, देव, ओबरा, दाउदनगर, हसपुरा, गोह, नवीनगर, कुटुम्बा, बारूण एवं रफीगंज प्रखंड़ के तमाम क्षेत्रों में दुर्गा पूजा की चहल -पहल की शुरुआत महालया से ही हो चुकी है।
” या देवी सर्वभुतेषु शक्ति रूपेण संस्थितः , नमतस्ये, नमतस्ये, नमतस्ये नमो नमः । “
