क्या अब बिहार को भगवान भरोसे छोड़ दिया गया है?


केन्द्रीय न्यूज डेस्क ख़बर सुप्रभात समाचार सेवा


17 जून को बिहार में एक बार फिर काला अध्याय सामने आया है। इसको ले न सिर्फ बिहार बल्कि पुरे देश में उबाल है। काला अध्याय इस लिए कह रहा हूं कि कानून और संविधान को ताख पर रखकर हथियार फेंकने तथा आत्म समर्पण करने वाले भोजपुर जिले के साहपुर थाना क्षेत्र अंतर्गत बिलौटी गांव निवासी भरत तिवारी को पुलिस अपने कब्जे में लेकर ठंडे दिमाग से गोली मारकर हत्या कर दी। पुलिस और कुछ छुटभैय्ए नेताओं द्वारा एनकाउंटर कहा जा रहा है। मैं यह दावा नहीं कर सकता कि भरत तिवारी को पुलिस एनकाउंटर में मौत हुई या फिर पुलिस द्वारा हत्या कर दी गई है। लेकिन जिस तरह से भरत तिवारी द्वारा हथियार फेंकते हुए वीडियो वायरल हुआ है और तब गोली मारना, फिर पुलिस पर प्राथमिकी दर्ज होना और न्यायिक जांच का आदेश मुख्यमंत्री द्वारा देना प्रथम दृष्टया हत्या ही कहा जा सकता है। लेकिन जब मामले में एसडीपीओ संजय शर्मा के विरुद्ध भी प्राथमिकी दर्ज है तो फिर एक्साइज विभाग में डीएसपी के रूप में पदस्थापित कर न सिर्फ नैतिकता का शर्मशार किया गया बल्कि कई गंभीर सवाल खड़ा हो रहा है। आम अवाम में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या गरीबों के लिए अलग कानून और रसुखदारों के लिए अलग कानून है? यदि नहीं तो संजय शर्मा को जल्दबाजी करते हुए नया पदस्थापन क्यों जबकि 2007 में भी इनके विरुद्ध फेंक एनकाउंटर का आरोप है और मामला न्यायालय में चल रहा है।सवाल यह है कि आखिर सरकार के पास कोई नैतिकता बची है या फिर नैतिकता को बाय बाय कर दिया है? यदि गरीबों के विरुद्ध हत्या जैसे संगीन मामला दर्ज होता है तो फौरन गिरफ्तारी होती है लेकिन एक एसडीपीओ के मामले में दोहरा मापदंड क्यों? जबकि यह भी आरोप लग रहा है कि पुलिस साक्ष्य को बदलने और पीड़ित परिवार को धमकीं दे रही है। तो क्या माना यह नहीं माना जाये की 17 जून को काला अध्याय के दिन के बाद एसडीपीओ संजय शर्मा को पुनः पदस्थापन से एक और काला अध्याय शुरू हुआ है और तब भरत तिवारी को न्याय मिलना मुमकिन सा प्रतीत हो रहा है?