बालू-शराब माफिया व सरकारी अधिकारी के त्रिगुट मकड़जाल में फंसे लोग कर रहे हैं त्राहिमाम

नवादा से डीके अकेला की रिपोर्ट

सम्पूर्ण बिहार और खासकर नवादा में बालू और शराब माफिया आजकल सरकारी संरक्षण में धड़ल्ले से फलफूल रहे हैं।यहां बेरोकटोक सरकारी नियम,कानून को ठेंगा दिखाते हुए सिंह गर्जन के साथ माफिया तथा सरकारी भ्रष्ट अधिकारी चांदी काट रहा है। इसका बेहद कड़वा,संगीन एवं बड़े गंभीर खामियाजा भुगतने के लिए लोग काफी विवश एवं मजबूर हैं। सच्चाई को परोसने के साथ अभिव्यक्ति एवं

डीके अकेला

विरोध के मूल संवैधानिक कानूनी हक- अधिकारों का प्रयोग करने वाले अथवा पक्षधर लोग हमेशा से ही सरकार के मुख्य टारगेट व दमन के अचूक सटीक निशाने पर थे, आज भी हैं व आगे भी निःसंदेह रहेंगे। प्रिय देशभक्तों,यह तो एक कड़वा सच है कि आज के इस मौजूदा दौर में सच्चाई के रास्ते पर चलने का मतलब है कि *तलवार के धार पर ही चलना *
इतना खुलल्म…खुल्ला बोलने के लिये , नैतिक और सामाजिक साहस व दृढ़ता तो चाहिये…?


फिर भी सच्चाई और वस्तुगत ज़मीनी हक़ीक़त की तहक़ीकात निष्पक्ष और निर्भीकता के साथ निर्विवाद तरीके से अवश्य होनी चाहिये….? क्रूर बालू व शराब के माफिया,भ्रष्ट कमीशनखोर नौकरशाहों,दलाल व दलबदलु नेताओं के त्रिगुट गठजोड़ के नंगा नाच व बर्दाश्त से फाजिल है।ज्यादा आक्रामक दमनात्मक रुख से आम आवाम काफी चिंतित,दहशत के साए में जीने को मजबूर व भारी आक्रोशित हैं। राख के तले शोला प्रज्वलित है। अगर समय रहते इस कृत्रिम उत्पन्न संकट पर स्थाई रूप से काबू नहीं पाया गया तो किसी भी समय जबर्दस्त विस्फोटक स्वरूप ग्रहण कर ले सकता है। भयंकर जान माल की अपूरणीय क्षति होने से इंकार कदापि नहीं किया जा सकता है। * अब पछताए होत क्या,* जब चिड़िया चुग गई खेत* वाली कहावत व्यवहार में साबित कर चरितार्थ कर दिया है। सुशासन और कानून के राज के नाम पर यहां विशुद्ध गुंडा,जंगल,माफिया और घोर तानाशाही लुटेरा राज के प्रत्यक्ष आगाज का यह एक जीता जागता प्रमाण नहीं तो और क्या है ? अब गुमी तोड़िए।
आज इस हकीकत से कोई भी इंकार नहीं कर सकता है कि नवादा की नदी से बालू के उठाव ( ग़लत… या सही तरीक़ा से ) के चलते नतीजतन मेँ, नवादा के ज़मीन का जलस्तर थमने के बजाय बड़ी तेज़ी से नीचे ही गिर रहा है….? यह काफ़ी चिंतनीय एवं सोचनीय उभरता मसला है, जिन्हें हल करना फौरी चुनौती है
जिसका भारी ख़मियाज़ा यहां के सारे बेकसूर मासूम लोग बेबसी व बेरहमी से भुगतने के लिए विवश व लाचार हैँ…?
इन्हीं मूलभूत कारणों के मद्देनजर सरकार गंभीरता पूर्वक विचार कर नदियों से बालू का उठाव को दिखावटी के रूप में कभी रोका भी जाता है.
लेकिन, चंद लोग, जिनका मिज़ाज अपने निजी स्वार्थ मेँ क़ानून को तोड़ने… रौंदने का मन खानदानी आदत बन चुका होता है, जिन्हें सियासी संरक्षण के साथ प्रोत्साहन भी हासिल होता है।मानते नहीं हैँ, पर चोरी और सीनाजोरी से बालू उठाते हैँ…! क्योंकि भ्रष्ट कमीशनखोर नौकरशाह और दलाल राज नेताओं का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष हाथ व साया अपराधियों और माफियाओं के साथ रहता है।
पुलिस अगर सख़्ती से पेश आती है, तो नेता अपने जातीय वोट की सुरक्षा के लिये, पुलिस पर बेजा अनिधिकृत्य दबाव भी तो बनाने लगते हैँ…? तबादला से लेकर निलंबन की तलवार भी गर्दन पर हमेशा लटका रहता है। यह सही वस्तुगत ज़मीनी तथ्य व हक़ीक़त है। लुटेरे चंद खूंखार कॉर्पोरेट घरानों की दलाली एवं रातदिन एड़ी चोटी एक करने वाली और दमनकारी अमरीकी साम्राज्यवादी शासक दुनिया के दुश्मन ट्रंप के हुक्मी चाकर हैं। डबल ईंजन सरकार की इशारे पर ठुमका लगाने वाली तथाकथित सुशासन व कानून की राज में भला पुलिस भी तो दूध की धूलि हुई नहीं है…? * चोर- चोर मौसेरे भाई और सांझे हंसुआ रखे पजाई।* माफिया, भ्रष्ट नौकरशाह और दलाल राज नेताओं के त्रिगुट लूट,दमन एवं शोषण के मामले में पूर्णतः एक जूट हैं, लेकिन लुटे हुए माल में हिस्सेदारी के लिए भी आंतरिक अंतर्विरोध बरकरार रहता है। इसके कारण भयानक दुखद हादसा के रूप में दिल को दहला देने वाली परिणाम आए दिन में परिणत हो जाया करता है।
नतीजा, ” बालू चोर और भ्रष्ट पुलिस ” का एक गठजोड़ बन जाता है ,क्योंकि जिन्हें वोट और कुर्सी किसी भी कीमत पर चाहने वाली सरकार की सह व संरक्षण मिलना लाजिमी व सुनिश्चित है। बालू व शराब माफिया अगर किसी भी स्तर का नेता है, तब तो पुलिस के हाथ.. पांव वैसे ही फुले हुए रहते हैँ….? पेट और सर दर्द से बेचैन हो जाते हैं।
” बालू और शराब ” के मामला मेँ यही हुआ है, जिसके नतीजे मेँ ” बालू चोर से बालू माफ़िया ” जैसे शब्द का जन्म हुआ, जो सच भी है…! सरकारी संरक्षण में यह रातदिन तेजी से फल फूल रहा है। क्योंकिपिया भये कोतवाल तो अब डर काहे का ?
यही हाल ” दारू व शराब ” के अवैध धंधा से भी निकला है…! यह कड़वी सच है कि सरकारी संरक्षण में धड़ल्ले से यहां बालू और शराब का काला धंधा आज अंधाधुन बेहिसाब चल रहा है।
इन दोनों अवैध कामों… या.. माफ़िया गिरी मेँ काफ़ी… बेतहाशा दौलत तथा कमाई भी है.रूपये छींटा हुआ है, जरूरत है चुनने वालों का
ऐसी नाजायज़ दौलत से उपजी चमक… देखकर ही वैचारिकता की फिसलन में फीसली ये सभी भ्रष्ट पार्टियों से टिकट प्राप्त करने के चांस भी हासिल होते है….!
जीत गए, तो ” पौ बारा “, बारहों अंगुली घी में डूबा है और हार गए तो ” नेता जी ” तो रहेंगे ही….? यह प्रचलित पद्धति है।
ऐसा ही कुछ नवादा मेँ भी दिख रहा है, जो सर्वविदित एवं काफी चर्चित हैं .?
इस घटना मेँ नारदीगंज के एक कमीशनखोर S. I. को बालू माफिया ने कुचल दिया ,जो PMCH में जिंदगी और मौत के बीच आख़िरी सांस लेने व्यग्र व उत्सुक हैं।उस S. I. को तो ज़िम्मेदारी ही दी गई है अवैध बालू लदे ट्रैकटर को पकड़ना है।
लेकिन, ज़िम्मेदारी का निर्वाह करना ही, बालू माफ़िया के दिलों दिमाग की निगाह मेँ कांटे की तिरछी सुल जैसा जघन्य जुर्म बन गया., जो दिल की गहराई और संवेदना को चीरकर तार -तार कर दिया है..?
जिसकी सज़ा माफ़िया ने उसे फ़ौरन… घटना स्थल पर ही दे दिया….! यह अनुकरणीय है।
खाता न बही, जो तानाशाही दमनात्मक डबल ईंजन की सरकार एवं भ्रष्ट,लंपट माफ़िया कहे वही सही….?
इसी तरह नवादा नगर के अंतर्गत नारदीगंज थाना मेँ ऐसे ही बालू माफ़िया ने, S. I. को सुनियोजित साजिश से कुचलने की निर्मम घटना के साथ ही वारसलीगंज थाना क्षेत्र के अंतर्गत दो स्कूली बच्चियों को कुचल देने जैसी दिल दहला देने वाली खबरें से खामोशी की घोर बदबू जानलेवा आ रही हैँ…! पुरे बिहार की सियासत को सरकारी संरक्षण में संचालित करने वाले लोग हमेशा दोहन व शोषण में अग्रिम कतार में खड़े नज़र आते रहेंगे। सरकारी संरक्षण में घोषणा करने के बाद भी अपने मुख्य उद्देश्य व लक्ष्य एवं जिम्मेदारी से पीछे हटने के पीछे कौन सी मजबूरी व लाचारी है ,? कल्पना करनी चाहिये कि बालू और शराब माफ़िया का मनोबल किस क़दर बेलगाम बढ़ गया है? इसके सह और संरक्षण देने वाले कौन सी काली करतूतें और असावधानियां और विफल कार्यनिष्ठा के लिए मूलतः गलत व अधिकृत जिम्मवार हैं ?
नारदीगंज थाना के S. I. को कुचलने के इलज़ाम मेँ बेकसूर जिन के साथ सरकार प्रायोजित साजिश के तहत क्रूर पुलिसिया दमनात्मक कार्रवाई की गई है, उन्हें हर्जाना के साथ छोड़ा जाने की अपील तो की ही जानी चाहिये , ” बालू चोर… बालू माफ़िया ” को ग्रामीण स्तर से भी जातीय व सियासी तौर पे उन्हें वहिष्कार का शिकार बनाया जाना चाहिये….? यह मौजूदा वक्त और समय की पुकार है।
नवादा का पुलिस महकमा और कूपमण्डक विचारधारा से लैश उसके चाटुकार पलटबाज दलाल के प्रति मेरे तास्सूर भी ख़ुश करनेवाले नहीं हैँ.
रोह का भट्टा गांव की चर्चित मोब्लिन्चिंग की घटना औरइसी वर्ष रामनवमी के शोभा यात्रा जुलुस के दौरान रोह मेँ भड़का दंगा की घटना का पी. यू. सी. एल. की नवादा जिला इकाई के टीम के साथ स्थल अध्ययन करने के दौरान पुलिस की रवैया ,जो काफी निकृष्ट और पक्षपातपूर्ण रवैए को समझने का बेहतरीन मौक़ा मिला है. ये काम नामुमकिन बिल्कुल नहीं है, बहूत मुश्किल तो है….! क्रांतिकारी,जनवादी,संघर्षशील लोकतांत्रिक शक्तियों का मोर्चा और संगठित समझौताहीन जन संघर्ष जो शांतिपूर्ण जनतांत्रिक तरीके से संचालित करना आज की मौजूदा वक्त व परिस्थिति की फौरी मांग बन चुकी है।