अम्बुज कुमार खबर सुप्रभात समाचार सेवा
व्यवहार न्यायालय औरंगाबाद के परिवार न्यायालय में आपसी सहमति से तलाक और पारिवारिक मामलों में समझोता में वृद्धि हो रही है, अधिवक्ता सतीश कुमार स्नेही ने बताया कि परिवार न्यायालय में हर माह 100 से अधिक वाद दायर किया जा रहा है, पिछले पांच सालों से पारिवारिक मामलों की संख्या में वृद्धि होती जा रही है, समझ की कमी, आधुनिक संस्कृति, मोबाइल युक्त दिनचर्या, विश्वास,संयम और धैर्य की कमी, क्रुरता ,असहनशील, अध्यात्म क्षान अभाव , नशापान, व्यभिचार , परित्याग ,एकल परिवार भी इसका वजह बन रहें हैं , अधिवक्ता ने आगे बताया कि नवदम्पत्ति शादी के एक साल बाद बिना कुछ आरोप लगाये
सहमति से तलाक वाद प्रस्तुत कर रहे हैं 2025 के संशोधन से तलाक के लिए इंतजार अवधि
कुछ मामलों में छः महीने से घटाकर तीन माह कर दी गई है, व्याभिचार को तलाक का आधार बनाये रखा है, ओनलाइन आवेदन स्वीकार किया जाएगा,शराब पीने के बाद भी दुर्व्यवहार को क्रुरता मानी जाएगी, भरण-पोषण मामले में हर दो साल पर गुजारा भत्ता में 5% वृद्धि हो सकती है और डिजिटल सुरक्षा पर जोर दिया गया है, परिवार न्यायालय औरंगाबाद में कुछ पक्षकारों का परिवार न्यायालय के अलावे अन्य न्यायालय में भी केस होता है अन्य न्यायालय में वाद समाप्ति के साथ परिवार न्यायालय के वाद निष्पादन हितकर होता है, आपसी सहमति से तलाक के लिए एक साल से अलग-अलग रहना आवश्यक होता है, दोनों पक्षकार को शादी खत्म करने की सहमति, शादी प्रमाण पत्र, दोनों का पहचान पत्र,निवास प्रमाण पत्र,अलगाव अवधि, शादी के सामुहिक फोटो और तलाक समझौता ड्राफ्ट आवश्यक होता है जिसमें बच्चे, सम्पत्ति और भरण पोषण के मुद्दों पर सहमति होती है, न्यायधीश के समक्ष दोनों पक्षकार उपस्थित होते हैं, भरण-पोषण के मामले में निर्णय से पुर्व पति के तीन साल का आयकर रिटर्न,वेतन स्लिप, बैंक स्टेटमेंट, बच्चों का संख्या, स्वामित्व दस्तावेज, रोजगार के साधन देखा जाता है ऐसा इसलिए होता है कि पति अपने कर्तव्य से यह कह कर विमुख नहीं हो सकता है कि हमने नौकरी छोड़ दी,हमरा कोई सम्पत्ति नहीं है,या हम खुद बेरोजगार हैं तो भरण-पोषण कहां से देंगे, लड़की पक्षकार को यह सिद्ध करना पड़ता है कि सभी आय के स्त्रोत से पति का आय कितना है इसी कारण कोर्ट एक मामले में पत्नी का भरण-पोषण 45 हजार प्रति माह का आदेश हुआ वहीं दुसरी मामले में 09 हज़ार भरण पोषण प्रति माह का आदेश दिया गया है, कई बार ऐसा होता है कि व्यवहार न्यायालय परिसर और परिवार न्यायालय कोर्ट के बाहर पति-पत्नी और उनके परिजन आपस में बहस कर उलझ जाते हैं जिन्हें न्यायालय सुरक्षा कर्मी हटाते हैं,बीएनएस की धारा -82 द्वितीय विवाह समाज में रोकता है, किसी स्त्री से पहले विवाह शुन्य होये बिना, जानकारी देकर विवाह करने पर सात साल की सजा और जुर्माना लगाता है और पहली विवाह कानुनन रहते उसे छिपाकर दुसरी विवाह करने पर दस साल सज़ा का प्रवधान रखा है,अधिवक्ता ने कहा कि अंत में कहना चाहूंगा कि लगता है कि समाज को किसकी ग्रहण लग गया है समाज के शत् प्रतिशत लोग पच्चीस वां, पच्चास वां शादी के सालगिरह मना पाएंगे या नहीं, हमारे समाज में
सम्बन्ध विच्छेद पहले बहुत ही कम था।
